राहुल क्‍यों दें कांग्रेस अध्‍यक्ष पद से इस्‍तीफा?

आशीष बागची

2019 के आम चुनावों में अन्‍यान्‍य दलों के मुकाबले राष्‍ट्रीय स्‍तर पर कांग्रेस की सबसे अधिक दुर्गति हुई है। उसके मात्र 52 प्रत्‍याशी ही जीत पाये हैं। हालांकि, 2014 के चुनावों के मुकाबले उसे आठ सीटें अधिक मिली हैं पर पूरे पांच साल बाद हुए चुनावों में मात्र इतनी ही सीटें बढ़ने पर लोगबाग यह सवाल उठा रहे हैं कि क्‍या कांग्रेस खत्‍म होने के कगार पर पहुंच रही है और राहुल गांधी को अध्‍यक्ष पद से इस्‍तीफा क्‍यों नहीं देना चाहिये? इस चुनाव की दो-तीन विशेषताएं रही हैं। उसके नौ पूर्व मुख्‍य मंत्री चुनाव हार गये हैं और स्‍वयं राहुल गांधी अपनी परंपरागत सीट अमेठी से चुनाव हार गये हैं। यह वाकई पार्टी के लिए शोचनीय बात है।

उसके पूर्व मुख्‍य मंत्रियों में दिल्‍ली से शीला दीक्षित, हरियाणा से भूपिंदर सिंह हुड्डा, उत्‍तराखंड से हरीश रावत, मध्‍यप्रदेश से दिग्विजय सिंह, कर्नाटक से वीरप्‍पा मोइली, महाराष्‍ट्र से सुशील कुमार शिंदे, महाराष्‍ट्र से अशोक चौहान, अरुणांचल से नबाम तुकी और मेघालय से मुकुल संगमा इस बार चुनाव हार गये हैं।

कांग्रेस में चहुंओर हताशा-

एक ओर जहां नरेंद्र मोदी विजेता व हीरो बनकर उभरे हैं दूसरी ओर राहुल गांधी पस्‍त हिम्‍मत वाले दिख रहे हैं। नेहरु-गांधी परिवार के उत्‍तराधिकारी की यह दशा वाकई शोचनीय है।

उत्‍तरोतर बुरी हार-

ऐसा माना जा रहा था कि 2014 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने अपने जीवनकाल की सबसे बुरी हार देखी है। लोगों को उम्‍मीद थी कि राहुल गांधी के अध्‍यक्ष बनने के बाद कांग्रेस आगे बढ़ेगी।

गुजरात और कर्नाटक में बढ़िया प्रदर्शन करने, पंजाब, राजस्‍थान, छत्‍तीसगढ़ और मध्‍यप्रदेश में अपनी सरकार बनाने के बाद उम्‍मीद यही थी कि कांग्रेस 2019 लोस चुनावों में कम से कम तीन अंकों का आंकड़ा पार करेगी। पर, ऐसा नहीं हो सका।

 राहुल लोस में बैठेंगे-

ऐसा नहीं है कि राहुल गांधी लोस में नहीं बैठेंगे। अमेठी सीट हारने के बावजूद वे केरल के वायनाड सीट से जीतने की वजह से लोस में ही बैठेंगे पर जिस शान से अपनी खानदानी सीट अमेठी की वजह से बैठते थे, वह रुतबा उन्‍हें हासिल नहीं हो पायेगा।

हालांकि लोगों को यह उम्‍मीद नहीं थी कि वर्तमान लोस चुनाव में कांग्रेस कुछ बढि़या करेगी पर यह तो माना जा रहा था कि कुछ अच्‍छा करेगी। मगर जब परिणाम सामने आया तो सभी चौंक से गये।

सवाल दर सवाल इसके साथ ही यह सवाल भी पूछा जाने लगा है कि क्‍या अब कांग्रेस में गांधी युग का अंत आ गया है या परिवार की राजनीति भी इसी के साथ खत्‍म होगी?

हार के बाद राहुल गांधी ने हार की जिम्‍मेदारी पूरी की पूरी अपने ऊपर ले ली है और अध्‍यक्ष न बने रहने पर अड़े हुए हैं, पर कांग्रेसी हैं कि मानने को तैयार नहीं हैं।

यही वजह है कि चुनावी राजनीति के इतिहास में कांग्रेस के इस बेहद खराब प्रदर्शन से राहुल गांधी के नेतृत्‍व पर सवाल उठ खड़े हो रहे हैं। इसके बावजूद कि राहुल गांधी ने चुनावों में कड़ी मेहनत की, कांग्रेस को मजबूती देने के लिए बहन प्रियंका को औपचारिक रूप से राजनीति में उतारा और लगा कि कांग्रेस कुछ बदलने जा रही है। पर, ऐसा कुछ नहीं हुआ। प्रियंका के आने से खासकर उत्‍तर प्रदेश में 2014 में जो कांग्रेस दो सीटें जीतकर लोकसभा में पहुंची थी, इस बार एकमात्र रायबरेली से जीत पाई।

कांग्रेस की रणनीति में नया कुछ नहीं था-

ऐसा माना जा रहा है कि कांग्रेस ने जिस रणनीति पर काम किया वह विपक्षियों के लिए जाना-पहचाना था और यही उसकी सबसे बड़ी नाकामी साबित हुई। इसे कांग्रेसी विचारधारा की नाकामी के बजाय भाजपा की चुनावी समीकरण के साम-दाम-दंड-भेद की जीत कही जानी चाहिये।

वैसे बीते सालों में राहुल गांधी को लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं में जो जोश हुआ करता था वह इस बार उनके अध्‍यक्ष पद पर इस्‍तीफे की घोषणा के बाद भी गायब है और उन्‍हें मनाने का प्रयास सिर्फ वरिष्‍ठ नेता कर रहे हैं, आम कार्यकर्ता नहीं।

यही वजह है कि अकबर रोड पर जो कांग्रेस कार्यालय है वहां नेताओं की भीड़ तो है पर कार्यकर्ताओं की भीड़ गायब है। इसे समझा जाना चाहिये कि कार्यकर्ता किस हद तक हताश हैं।

20 साल पुराना नजारा दिखा-

बीस साल पहले भी ऐसा ही नजारा दिखा था जब सीताराम केसरी को हटाकर सोनिया गांधी को कांग्रेस अध्‍यक्ष बनाया गया था। इस बार भी नजारा लगभग वैसा ही है। एक बार पुन: कांग्रेस संकट में है तो राहुल को ही पद पर बनाये रखने का प्रयास किया जा रहा है।

वैसे कुछ हद तक यह बात सही भी है। इसकी पुष्टि राष्‍ट्रीय जनता दल (राजद) के अध्‍यक्ष लालू प्रसाद यादव के बयान से भी होती है। उनका भी मानना है कि अगर अध्‍यक्ष पद से राहुल हटते हैं तो यह आत्‍मघाती कदम होगा और कांग्रेस पूरी तरह भाजपा के चंगुल में फंस जायेगी। उनका यह भी मानना है कि राहुल का अध्‍यक्ष पद से हटना उन सभी सामाजिक और राजनीतिक ताकतों के लिए भी झटका होगा जो संघ परिवार के खिलाफ लड़ रही हैं।

लालू की बात एक हद तक सही-

वैसे यह एक हद तक सही भी है कि गांधी होने की वजह से ही राहुल गांधी पार्टी के अध्‍यक्ष बने हैं। परंतु जैसा कि लालू यादव कहते हैं वाकई इस समय देश और कांग्रेस दोनों को ही राहुल गांधी की दरकार है। यह सही है कि वंशवाद भारतीय राजनीति का एक कोढ़ है पर चाहे वह सपा हो या बसपा, बीजू जनता दल, वाईएसआर कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, राजद, टीडीपी, सभी कहीं न कहीं वंशवाद से प्रभावित हैं और उनके नेताओं की आगामी पीढ़ी अभी से तैयार हो रही है।

पर, हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि वंशवाद से भी खतरनाक व्‍यक्तिवाद है। और, वाम दलों को छोड़कर कोई भी इससे अछूता नहीं है। भाजपा जो कि कैडर आधारित पार्टी मानी जाती है वह पूरी तरह मोदी के व्‍यक्तित्‍व के आगोश में छिप सी गयी है। 2019 के चुनाव में लोगों ने देख लिया कि भाजपा उम्‍मीदवार सिर्फ और सिर्फ मोदी के ही नाम पर जीते हैं।

मीडिया भी चेते-

कहना न होगा राहुल गांधी से इस्‍तीफा मांगने वालों में मीडिया भी अग्रणी भूमिका निभा रही है। अगर राहुल इस्‍तीफा देते हैं तो सभी क्षेत्रीय दलों के अध्‍यक्षों को भी इस्‍तीफा देना चाहिये जिनके अपने दल चुनाव हार चुके हैं। ऐसे में मीडिया को जीतने वाले दल की ओर न बहकर बाकी दलों को कुछ समय देना चाहिये।

उसे यह समझना होगा कि ऐसा पहली बार हो रहा है जब भारत सरकार एक ही व्‍यक्ति में समा रही है। हमारा लोकतंत्र 70 साल का हो रहा है ऐसे में राहुल गांधी के इस्‍तीफे से न सिर्फ विपक्षी राजनीति को झटका लगेगा और कांग्रेस कमजोर होगी बल्कि मोदी-शाह का निशाना सफल हो जायेगा, जो आशंका लालू यादव ने व्‍यक्‍त की है।

(ये लेखक के निजी विचार हैं)