विकास की राह पर खुश क्यों नहीं भारत

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दुनिया भर में कोरोना वायरस के बढ़ते प्रकोप के बीच पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र ने ‘वर्ल्ड हैपिनेस इंडेक्स 2020’ जारी किया। फिनलैंड ने दुनिया के सबसे खुशहाल देशों की सूची में लगातार तीसरी बार पहला स्थान हासिल किया है, जबकि भारत पिछली बार के मुकाबले चार पायदान फिसलकर 144वें स्थान पर पहुंच गया है। 156 देशों की सूची में अफगानिस्तान सबसे कम खुशहाल देश है। रिपोर्ट के मुताबिक इन 156 देशों की खुशहाली जिन 6 मानकों पर परखी गई, वे हैं- प्रति व्यक्ति जीडीपी, सामाजिक सहयोग, उदारता, भ्रष्टाचार, सामाजिक स्वतंत्रता और स्वास्थ्य।

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संपन्नता की दौड़

संयुक्त राष्ट्र सतत विकास समाधान नेटवर्क ने यह रिपोर्ट जारी की है और इसके लिए डेटा साल 2018 और 2019 में जुटाया गया था। जाहिर है, इस साल दुनिया भर में फैली कोरोना वायरस की दहशत का असर इस रिपोर्ट में नहीं देखा जा सकता। रिपोर्ट में इस बात पर भी खासतौर से गौर किया गया है कि दुनिया भर में चिंता, उदासी और क्रोध सहित तमाम नकारात्मक भावनाएं बढ़ी हैं।

हैपिनेस इंडेक्स के 20 शीर्ष स्थानों में से एक भी एशिया के किसी देश के हिस्से नहीं आया है। पिछले साल 140 वें स्थान पर रहा भारत इस बार चार पायदान और फिसल कर 144 वें नंबर पर पहुंच गया है। पाकिस्तान हमसे कहीं बेहतर 66 वें नंबर पर रहा, जबकि चीन 94 वें, बांग्लादेश 107 वें और नेपाल 92 वें स्थान के लिए उपयुक्त पाया गया। इस लिस्ट में पहले 10 स्थानों में से नौ पर यूरोप के देश बने हुए हैं। सबसे खुशहाल देशों में फिनलैंड के बाद डेनमार्क, स्विट्जरलैंड, आइसलैंड और नार्वे को रखा गया है। वहीं सबसे कम खुश देशों में अफगानिस्तान के बाद दक्षिणी सूडान, जिम्बाब्वे और रवांडा को गिना गया है। रिपोर्ट तैयार करने में अहम भूमिका निभाने वाले जॉन हेलीवेल ने एक बयान में कहा कि सबसे खुश देश वे हैं, जहां लोगों को अपनेपन का अहसास होता है, जहां वे एक-दूसरे पर और अपने साझा संस्थानों पर भरोसा करते हैं और उनका आनंद लेते हैं। एक दूसरे पर विश्वास होने से लोगों की कठिनाइयां कम होती है और देश का कल्याण होता है।

उपभोग के कुछ साधन भारतीयों को जरूर मिल गए हैं, पर कई बुनियादी समस्याएं अब भी अनसुलझी हैं

इस इंडेक्स को देखकर लगता है कि भारत में लोग अपनी जिंदगी से खुश नहीं हैं। यह वाकई चिंता की बात है कि रैंकिंग में भारत 143 देशों से पीछे है। शहरों की बात करें तो भारत की राजधानी दिल्ली पूरी दुनिया के कम खुशहाल शहरों में सातवें पायदान पर है। अधिकतर भारतीय प्रसन्न क्यों नहीं हैं, इसकी तीन प्रमुख वजहें है। पहली यह कि सरकार के स्तर पर उनकी बुनियादी जरूरतें मसलन शिक्षा, चिकित्सा और न्याय पूरी नहीं हो पा रही हैं। देश की आर्थिक प्रगति के बाद समाज के विभिन्न वर्गों में आर्थिक विषमता तेजी से बढ़ी है। लखपति करोड़पति हो गए और करोड़पति अरबपति बन गए। साधारण आदमी का जीवन भी बदला है लेकिन उसकी समस्याएं बहुत बढ़ गई हैं- महंगाई, बेरोजगारी, रुपये का अवमूल्यन, किसानों की दुर्दशा, भ्रष्टाचार, लचर कानून व्यवस्था, महिलाओं के साथ अपराध आदि। इनका सामना करते हुए उसकी खुशियां कम हुई हैं और जीवन में अंधेरा बढ़ा है। निर्धन वर्ग को उत्पादन प्रक्रिया का हिस्सा बनाने की समुचित कोशिशें नहीं हो रही हैं। यह वर्ग भुखमरी से तो उबर रहा है मगर शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय उसकी पहुंच से अभी भी बाहर हैं। इससे ठीक ऊपर वाले तबके यानी मध्यम वर्ग को सरकारी मदद के लायक भी नहीं माना जाता। आशंकाओं ने इस वर्ग को सर्वाधिक पीड़ित और परेशान बना रखा है। ऐसे लोगों के जीवन में खुशी कहां से आएगी।

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खुशहाल न होने की एक बड़ी वजह मूल्यगत भी है। समाज में एक तरह की होड़ सी लगी हुई है। प्रतिष्ठा आज उसे ही मिलती है, जो साधन संपन्न है। चारित्रिक विशेषताओं का भारतीय समाज में कोई सम्मान नहीं रह गया है। पहले धर्म जैसे माध्यमों से लोगों को भौतिकता से मुक्त होकर चरित्रवान रहने की शिक्षा मिलती थी, लेकिन आज धर्म के अगुआ ही साधन जुटाने और उसका प्रदर्शन करने में लीन नजर आते हैं। असल में प्रसन्नता और खुशहाली भीतर से आती है, जब हमारे अंदर सब कुछ ‘लेने’ के भाव से ज्यादा परिवार या समाज को देने का भाव आएगा तभी हम प्रसन्न हो सकते है। तीसरी वजह हमारी वर्तमान शिक्षा पद्धति में है। इस शिक्षा प्रणाली ने डिग्री लेने और साधन संपन्न बनने को ही अपना लक्ष्य बना रखा है। पद और पैसा ही इसका मकसद हो गया है। कॉरपोरेट सेक्टर ने अधिक से अधिक ऊंचाई पर पहुंचने को एक दर्शन के रूप में प्रचारित किया है। ऐसे में एक नौजवान को यह बताने वाला कोई नहीं है कि जीवन में खुशी और संतोष ज्यादा बड़ी चीज है। बहुत ज्यादा पैसा हासिल करके भी अगर जीवन में संतुष्टि नहीं है तो सारा हाथ-पांव मारना व्यर्थ है।

(यह लेखक के अपने विचार हैं, यह लेख NBT अखबार में प्रकाशित है।)

शशांक द्विवेदी

 

बहरहाल, नई पीढ़ी को इस सच से अवगत कराने के लिए दिल्ली सरकार ने हैपिनेस का एक पाठ्यक्रम शुरू किया है। इस तरह का प्रयोग और राज्यों में भी किया जाना चाहिए। मोबाइल ,इंटरनेट और तकनीक के मायाजाल ने भी हमारी ख़ुशी को बाधित किया है। लोग उसी में उलझकर रह गए हैं। जरूरत से ज्यादा ये चीजें हमारी लत बन चुकी हैं। तकनीक का उतना ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए जिससे आपकी मौलिकता और प्रसन्नता प्रभावित न हो।

 

 

हमारी अपनी भूमिका

हमारे पास खुद को और अपने परिवार को देने के लिए समय होना चाहिए, वरना ऐसे आर्थिक विकास या साधन संपन्नता का क्या फायदा, जो न हमें खुशी दे सके, न ही हमें किसी और को खुशी देने लायक छोड़े। सरकारों के साथ ही यह हमारी भी जिम्मेदारी है कि समाज के अंतिम पायदान में खड़े व्यक्ति का जीवन स्तर ऊंचा उठाने में सहयोग दें। इसके बाद ही सही मायने में सबको प्रसन्नता महसूस होगी।

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-Adv-

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