SC judges

भारत की न्याय व्यवस्था के लिए काला दिन

आशीष बागची

सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने शुक्रवार को दिल्लीय में जो साझा प्रेस कांफ्रेंस की उसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है। अब तो सामान्यी आदमी भी यह कहने लगा है कि देश की न्याय व्यवस्था की प्रक्रिया बदलनी चाहिये। जब सर्वोच्च् न्याययालय ही एक पक्षीय है तो निचले अदालतों से निष्प‍क्ष न्यााय की क्या उम्मीअद की जाये? देश के न्यानयिक इतिहास का यह बेहद चौंकाने वाला मामला है जब चार ऐसे जजों ने साझा प्रेस कांफ्रेंस की जिन्हें बेहद ईमानदार माना जाता है। जिसने भी इस प्रेस कांफ्रेंस को सुना दंग रह गया। हर फ्रंट पर आगे ही आगे रहने वाले बीजेपी के राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता सुब्रमण्यम स्वामी को भी कहना पड़ा कि चारों बेहद ही ईमानदार और ज्ञानी जज हैं। मामला निश्च य ही बेहद गंभीर है।

न्याय व्यवस्था के इतिहास में पहली बार ऐसी प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई

चीफ जस्टिस पर आरोप लगाने वाले चार जजों में जस्टिस जस्ती चेमलेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ हैं। भारतीय न्याय व्यवस्था के इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट के जजों ने एकाएक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर पूरी न्याय व्यवस्था को हिला कर रख दिया। सुप्रीम कोर्ट के इन जजों के द्वारा चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया दीपक मिश्रा पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। इन जजों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट में इस समय सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। मुख्य न्या याधीश के द्वारा लगातार नियमों की अनदेखी की जा रही है।

सियासत और वकालत के क्षेत्र में खलबली

सुप्रीम कोर्ट के जजों के द्वारा लगाए गए आरोपों के बाद देश की सियासत और वकालत के क्षेत्र में खलबली मच गई है। अभी तक नेताओं से लेकर वरिष्ठ वकीलों ने इन आरोपों पर अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएं दी हैं। यह मानना होगा कि आज की प्रेस कॉन्फ्रेंस ने देश की न्यानयिक व्य वस्था् की पोल खोलकर रख दी है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया पर लगाए गए आरोप इस देश के लिए वाकई बहुत बड़ा धक्का है। सुप्रीम कोर्ट देश का सबसे बड़ा स्तंभ है। अधिकांश लोगों का मानना है कि इन आरोपों को अनदेखा किया जा सकता था, लेकिन जब पानी सिर से उपर निकल गया होगा तो इस प्रेस कॉन्फ्रेंस की जरूरत आ पड़ी होगी। इसमें कोई दो राय नहीं है कि देश की मौजूदा स्थिति में सुप्रीम कोर्ट का बहुत बड़ा योगदान है। यह पहली बार देश के लोगों ने देखा कि सुप्रीम कोर्ट के जज इन दिनों कितने तनाव में आ गए हैं।

न्याय व्यवस्था का वाकई काला दिन

अनेक वरिष्ठ् वकील मानते हैं कि भारत की न्याय व्यवस्था के लिए काला दिन है। लोगों का विश्वास न्याय व्यवस्था पर है। आज की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद देश के हर आम आदमी और नागरिक सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को शक के दायरे से देखेगा। आने वाला कल और भी खतरनाक होगा क्यों।कि शक गहरायेगा। अधिकांश वरिष्ठ अधिवक्ता मानते हैं कि आज की प्रेस कॉन्फ्रेंस ऐतिहासिक और दुर्भाग्यपूर्ण है। कभी सोचा नहीं गया था कि सुप्रीम कोर्ट को ऐसा दिन देखना होगा।

हमने अपनी आत्मा नहीं बेची

जस्टिस चेलामेश्वर और जस्टिस कुरियन जोसेफ ने कहा कि हम वह लेटर सार्वजनिक करेंगे, जिससे पूरी बात स्पष्ट हो जाएगी। चेलामेश्वर ने कहा, `20 साल बाद कोई यह न कहे कि हमने अपनी आत्मा बेच दी है। इसलिए हमने मीडिया से बात करने का फैसला किया।` चेलामेश्वर ने कहा कि भारत समेत किसी भी देश में लोकतंत्र को बरकरार रखने के लिए यह जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट जैसी संस्था सही ढंग से काम करे।

सबकुछ ठीक नहीं चल रहा

चीफ जस्टिस को जब इतने सीनियर जज पत्र में लिखते हैं कि बड़ी नाराज़गी और चिंता के साथ हमने ये सोचा कि ये पत्र आपके नाम लिखा जाए, ताकि इस अदालत से जारी किए गए कुछ आदेशों को रेखांकित किया जा सके, जिन्होंने न्याय देने की पूरी कार्यप्रणाली और हाईकोर्ट्स की स्वतंत्रता के साथ-साथ भारत के सुप्रीम कोर्ट के काम करने के तौर-तरीक़ों को बुरी तरह प्रभावित किया है, तो वाकई लोगों को सोचने को मजबूर होना पड़ा होगा कि शीर्ष स्तंर पर सबकुछ ठीक क्यों नहीं चल रहा है।

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पत्र में आगे जब यह लिखा जाता है कि हमें ये बताते हुए बेहद निराशा हो रही है कि बीते कुछ वक़्त से जिन दो नियमों की बात हो रही है, उनका पूरी तरह पालन नहीं किया गया है। ऐसे कई मामले हैं जिनमें देश और संस्थान पर असर डालने वाले मुकदमे इस अदालत के चीफ़ जस्टिस ने ‘अपनी पसंद की’ बेंच को सौंपे, जिनके पीछे कोई तर्क नज़र नहीं आता। हर हाल में इनकी रक्षा की जानी चाहिए। तो, वाकई चिंता होनी स्वानभाविक है।

मुकदमे जो रोस्टोर के हिसाब से एलाट हों

उनका कहना है कि कलकत्ता, बॉम्बे और मद्रास में तीन हाईकोर्ट स्थापित होने के बाद न्यायिक प्रशासन में कुछ परंपराएं और मान्यताएं भलीभांति स्थापित हुई हैं। इन हाईकोर्ट्स के स्थापित होने के लगभग एक दशक बाद सुप्रीम कोर्ट अस्तित्व में आया। ये वो परम्पराएं हैं जिनकी जड़ें इससे पहले भी न्यायतंत्र में थीं। उनका इशारा साफ है कि कुछ मुकदमे जो रोस्ट र के हिसाब से एलाट होने चाहिये वे नहीं हुए हैं और इसका जनमानस पर अच्छा असर नहीं गया है।

लेटर में आगे लिखा गया, “रोस्टर तय किए जाने के नियमों से हटने से अप्रिय और अवांछित तौर पर संस्थान की पवित्रता पर संशय खड़ा होता है। हमें ये कहते हुए दुख हो रहा है कि नियमों का पालन सख्ती से नहीं किया गया। ऐसे मौके भी आए, जब देश और संस्थान पर प्रभाव डालने वाले मामलों को चीफ जस्टिस ने अपनी प्राथमिकता वाली चुनी हुई बेंचों को सौंप दिया, जबकि ऐसा करने का कोई आधार नहीं था। इसे किसी भी कीमत पर रोका जाना चाहिए। हम यहां इन मामलों का जिक्र इसलिए नहीं कर रहे हैं, ताकि संस्थान की छवि को नुकसान न हो। हालांकि, ये भी कहना चाहेंगे कि पहले से ही काफी हद तक संस्थान को नुकसान हो चुका है।” मानना ही होगा कि इस प्रेस कांफ्रेंस ने हमारी गिरती न्यााय व्यतवस्था की एक बार फिर पोल खोल दी है। इस नुकसान की भरपाई निकट भविष्य में शायद संभव न हो पाये।

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