परदेसी की गठरी

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सुबह सुबह, भोला की मां ने फुलवा को बताया कि भोला का फ़ोन आया था। सारे लोग सुल्तानपुर तक पहुंच गए है, कल सुबह तक आ भी जाएंगे। फुलवा ने भोला की मां की बातें सुनी और फिर अपने में कहीं खो गयी।

मेरे सुरेश ने तो फ़ोन ही नहीं ख़रीदा, मैंने कहा भी कि बेटा एक फ़ोन अपने लिए और एक छुटकी के लिए खरीद ले। कम से कम तेरा हालचाल मिल जायेगा। पर मेरी सुनता कहां है, बचपन से ही ज़िद्दी है। अपनी ही चलाता है। कुछ कहूं तो उल्‍टे मुझे ही सिखाने लगता है। कहता है कि मां दो फ़ोन की क़ीमत 4000 रुपया है, इतने में तो घर का छह महीने का राशन निकल जाएगा। कोई इमेरजेंसी होगी तो भोला की मां को फ़ोन कर दूंगा।

भोला मेरे साथ रूम में ही तो रहता है। मां देखो भोला के पास गांव में बिजली भी है उसकी मां फ़ोन चार्ज भी कर लेती है, तुम अपनी झोपड़ी में कहां से फ़ोन चार्ज करोगी। और भोला के पास तो दस बिस्‍वा खेत भी है और उसके बाबू जी दूध भी रोज़ आठ लीटर बेच लेते है। हमारे पास तो खेत भी नहीं है। और बाबा का पैर टूटा है तब से कुछ कर भी नहीं पाते। हमारा घर तो हमारी कमाई से ही चल रहा है ना। और तुमको प्रधान जी एक हज़ार रुपया ही तो देते है झाड़ू, सानी, बर्तन और सफ़ाई के। उसमें भी प्रधाइन चाची ताना मारती है, कहती हैं कि फुलवा तोहार घर तो हमरे बदौलत ही चलत बा।

कितना समझदार है मेरा बच्चा। बात तो हमेशा से ही समझदारी की करता है। उसके बाबू जी भी तो कहते हैं, फुलवा! हमको भगवान ने ग़रीब ज़रूर बनाया पर हमें सुरेश जैसा बेटा भी तो दिया है। 18 साल की उमर से परदेस में कमा रहा है ना कोई ऐब ना कोई बुराई। और देखो गांव के बच्चों को कोई गुटका खाता है, कोई बीड़ी पीता है। सुना है भोला तो आजकल शराब भी पीने लगा है।

फुलवा अपने विचारों में खोयी थी कि तभी छुटकी दौड़ती हुई आयी। मां भैया कब तक आ जाएंगे। छुटकी के मुंह में आम का टिकोरा भी था। फुलवा बुदबुदाई। बहुत सर चढ़ा कर रखा है सुरेश ने इसको। मैंने इससे बोला कि मेरे साथ परधान के घर चलाकर। कुछ मेरे काम में हाथ बंटा लिया कर। पर नहीं इसको तो भाई ने बोला है हमारी छुटकी कोई काम ना करेगी बस पढ़ाई करेगी। बताओ15 साल की हो गयी, इतनी उम्र में तो मेरी शादी हो गयी थी। पर सुरेश कहता है मां मैं पैसे जुटा रहा हूं। छुटकी को नर्स की ट्रेनिग कराऊंगा। देखना नर्स के ड्रेस में हमारी छुटकी अप्सरा की तरह लगेगी।

फुलवा आज ही पता नहीं क्‍यों सुरेश को कुछ ज़्यादा ही याद कर रही है। आज पूरे एक साल बाद आ रहा है सुरेश। ये तो भला हो करोना महामारी का नहीं तो मालिक छूट्टी कहां देता था उसको। करोना में फ़ैक्टरी बंद हो गयी तो छुट्टी मिल गयी उसको। रेल, बस सब बंद है। गांव के सारे बच्‍चे पैदल ही आ रहे हैं। सब फ़रीदाबाद में एक साथ ही तो रहते हैं।

मां को इतना शांत कुछ सोचते हुए देख छुटकी ने उसका ध्‍यान अपनी ओर खींचते हुए कहा। मां भैया की गठरी इस बार मैं ही खोलूंगी। पिछली बार तुमने खोला था। कितनी बेइमानी की थी तुमने। भइया का लाया हुआ लाल फ़्राक मुझे तुमने छह महीने बाद दिखाया था। मैं ही खोलूंगी गठरी इस बार। और भइया जो भी तुम्हारे लिए लाएगा मैं भी तुम्हें छह महीने बाद दूंगी। गठरी खोलते समय तुम्हें देखने भी नहीं दूंगी।

परदेसी की गठरी सिर्फ एक गठरी नहीं होती, वह तो उसकी यादों का पुलिंदा होता। परदेसी परदेस में अपनो को किस तरह से याद करता है वह सब उसकी गठरी बयान कर देती है। जब वह अपने बाबू जी को याद करता है तो उसे उनके पैर की फटी बेवाइयाँ दिखायी देती हैं। वह उनके लिए फूटपाथ पर बिकने वाले जूते ख़रीद कर उस गठरी में सहेज लेता है। जब मां की याद आती है तो उसके सामने मां की लाचारी उसकी फटी साड़ी के रूप में नजरों के सामने तैर जाती है। तो वो सेल से मां के लिए साड़ी ख़रीद लेता है। जिसे वह गठरी में करीने से संजो देता है। सिर्फ इतना ही नहीं इस गठरी में छोटी बहन की यादें भी सिमटी होती हैं। उस चुलबुली बहन की जो अपनी कक्षा की लड़कियों के सुंदर ज्योमेटरी बॉक्स, उनके सुंदर फ़्राक को देख कर ललचाती है। बस घर आकर इतना बोलती है भैया पता है आज मैंने अपनी क्लास की एक लड़की के पास बहुत सुंदर ज्योमेटरी बॉक्स देखा, उसका फ़्राक भी बहुत सुंदर था। पर क्या फ़ायदा बॉक्स को बंद करना पड़ता है और मैं तो सब उठा कर झोले में डाल लेती हुं। उस बहन की ललचायी नजरें जब भाई को याद आती हैं तब वो उसे सीधे किताब की दुकान पर ले जाती हैं जहां से वो बहन के लिए ज्‍योमेटरी बॉक्‍स खरीदता है। इसलिए परदेसी की गठरी केवल सामानो से नहीं भरी होती है बल्कि उसमें ढेर सारा प्यार, यादें, तड़प और मजबूरी भी होती है। जिन्‍हें परदेसी अपने साथ लेकर आता है ।

भइया की गठरी में क्या-क्या होगा? छुटकी का बालमन इसी ख्‍याल में उलझा है। उसके भइया ने कहा था छुटकी जब अगली बार आऊंगा तो बहुत भारी सी गठरी लाउंगा। उसको तुम ही खोलना क्‍योंकि वो गठरी मां से और ना बाबा से उठेगी। पता है अगली गठरी बहुत भारी होगी। उसको तुम ही खोलना। यही सोचते हुए छुटकी को नीद आ गयी। यह सोच कर सोयी की सुबह मां से पहले भी उठना है क्‍योंकि की भइया की गठरी भी तो मुझे पकड़नी है।

हर रोज छुटकी की नींद छह बजे तक खुलती थी। पर भइया से मिलने की बेचैनी और गठरी खोलने की ललक ने उसे भोर में ही उठा दिया।

छुटकी तैयार होकर कर गांव के बाहर चकरोड पर खडी होकर सड़क की तरफ़ एकटक देखे जा रही थी। जब हम किसी का इंतजार कर रहे होते हैं तो उसकी बेचैनी ही अलग होती है। वही बेचैनी छुटकी की आंखों में दिखायी दे रही थी। वो अपने भइया और उनकी गठरी को मां से पहले देखना चाह रही थी। उसके हाथ में एक आम का टिकोरा भी था। जिसे वह अपने सुरेश भइया को देने के लिए साथ लायी थी। यह टिकोरा उसी पेड़ का का था जिसे अपने बचपने में सुरेश ने लगाया था। इस बार उसमें फल भी आ गये हैं। छुटकी ने अपने भइया को यह बात बता भी दी थी।

धीरे धीरे सूरज चढ़ रहा है। सामने से कुछ लोग आते भी दिखायी दे रहे हैं। छुटकी की आंखे चमक उठीं। आ गया मेरा सुरेश भइया और उसकी गठरी। धीरे-धीरे लोग और नजदीक आ गये हैं। छुटकी की नजरें सुरेश को खोज रही हैं पर सुरेश को देख्‍ पा रहीं हैं। सुरेश भइया तो नहीं दिख रहे हैं। भोला भइया हैं, राम सजीवन भइया हैं, संतोष भैया, सीमा भाभी भी दिख रही हैं। उनका बेटा शैतान शास्वत भी दिख रहा है पर मेरे सुरेश भइया नहीं दिख रहे है। भइया पीछे रह गए लगता है। कोई बात नहीं थोड़ी देर और इंतजार कर लूंगी।

सारे लोग सामने आ गये। मुझे देखकर सीमा भाभी रोने लगी। अरे ये सब क्‍यों रो रहे हैं। सीमा भाभी मुझे गले लगाकर सड़क पर ही बैठ गयी है। क्या हुआ भाभी को? लग रहा है कि करोना महामारी से बच के आ गए उसकी ख़ुशी के आंसू है। पर मुझे पकड़ के क्‍यों रो रही है? और ये बार बार सुरेश भइया का नाम क्‍यों ले रही हैं?

सिर्फ सीमा भाभी ही नहीं सब सुरेश भैया का नाम लेकर क्‍यों रो रहे है।

सुरेश हम कुछ ना कर पाए… भोला भइया ऐसा क्‍यों बोल रहे हैं।

कहां रह गए सुरेश भैया?

छुटकी ने घबरा कर पूछा ।

सुरेश नहीं रहा छुटकी। भोला ने रुंधे गले से जवाब दिया।

सुरेश नहीं रहा?

इतना सुनते ही छुटकी के हाथ से आम का टिकोरा गिर गया। उसी रोड पर जिससे सुरेश भैया एक साल पहले गए थे। यह वही रोड है जहां पिछले दो घंटे से छुटकी सुरेश का इंतज़ार कर रही थी।

छुटकी बेसुध हो गयी।

जब आंख खुली तो सड़क पर पूरे गांव को इकट्ठा पाया। सब रो रहे थे। फुलवा और सुरेश के बाबू जी तो सड़क पर जैसे बेजान पड़े थे। वहीं छुटकी के बग़ल में वो गठरी पड़ी थी।

सबके मन में बस एक ही सवाल चल रहा था कि आखिर सुरेश को हुआ क्‍या?

स्थिति को संभालने की कोशिश करते हुए भोला ने बताया।

चाची चलते चलते सुरेश थक गया था। परसों उसको थोड़ा बुखार था। हम लोग लंभुआ तक पहुंचे थे। सब लोग एक पेड़ के नीचे बैठ गये थे आराम करने के लिए। वहीं सुरेश को पता नहीं क्या हुआ? दो गहरी सांस ली और लड़खड़ाती जुबान से बोला कि छुटकी तुझे नर्स नहीं बना पाउंगा। मां का ख़याल रखना। मुझसे बोला कि मेरी गठरी छुटकी को दे देना, बस उसके बाद उसकी सांसे टूट गयी।। चाची उसके कपड़े और रास्ते में घिस गयी चप्पल मैंने गठरी में रख दिया है। हम उसकी मिट्टी को अपने साथ लाना चाह रहे थे पर रास्ते में पुलिस ने ज़बरदस्ती जला दिया। बोल रहे थे क्या पता करोना से मारा हो ख़ुद तो मार गया पूरे गांव में करोना फैला देगा। भोला इतना बताते हुए फिर से रोने लगा। शाम तक फुलवा, छुटकी और उसके बाबू जी सब वहीं रोड पर पड़े रहे। परधान जी आए और सबको समझा बुझा कर गांव ले गए। झोपड़ी के सामने ही सबने पूरी रात बिता दी।

जाने वाला तो चला गया आज दसवां दिन है फुलवा, बेटे का सुद्धक तो कर दे। नाई और महा बाभन को बुला दिया है मैंने। आम के पेड़ पर परधान जी ने घंट भी बंधवा दिया है।। उठ कुछ खा पी ले और छुटकी को भी कुछ खिला दे। बेटे का सुद्धक पूरा कर नहीं उसकी आत्मा भटकेगी। भूत बन जाएगा। परधाइन चाची ने ज़िद करके सबको उठाया।

सुद्धक की तैयारी चल रही थी गठरी से सुरेश के कपड़े निकाल कर जलाने भी थे। छुटकी ने गठरी उठायी। बहुत भारी गठरी है ये तो। भइया ने सही कहा था इस बार वाली गठरी तो बहुत भारी है। मां- बाबू जी से तो नहीं उठेगी। कैसे उठेगी इस गठरी में सुरेश की अंतिम सांसे है। इस गठरी में सुरेश के जीवन के सपने और मां-बाप के बुढ़ापे का सहारा है। इस गठरी में बहन का नर्सिंग स्कूल भी है।

भइया सच बोलूं यह गठरी तो सिर्फ मां बाबूजी के लिए ही नहीं तेरी छुटकी के लिए भी बहुत भारी है। छुटकी के आंसू निकले जा रहे थे। आंसुओ को पोंछने की कोशिश करते हुए छुटकी ने गठरी की गांठ को खोला।

ये तो सुरेश भइया की वही पीली धारी वाली शर्ट है। जिसके बारे में भइया ने बताया था छुटकी मैंने पीली धारी वाली शर्ट ले ली है। नीले रंग की जींस भी लिया है। अरे जींस की जेब में ये कागज कैसा दिखायी दे रहा है।

छुटकी ने जेब में हाथ डाला तो उसमें पांच पन्ने मिले जो सुरेश के हाथो के लिखे थे। सुरेश की लिखावट तो छुटकी समझ ही गयी। क्‍या लिखा है इन कागज के टुकड़ों पर किसके लिए भैया ने लिखे थे। यह सोच कर छुटकी चिठ्ठी पढ़ने लगी।

मां बाबू जी को प्रणाम, छुटकी को ढेर सारा प्यार…

मां जैसा की तुम्हें बताया था कि करोना के कारण यहां फ़ैक्टरी बंद हो गयी है। तो गांव वालों के साथ मैं भी आ रहा हुं। कोई ट्रेन,बस नहीं चल रही है, इसलिए हम सब लोग पैदल ही आ रहे हैं। तुम चिंता मत करना कई लोग है आराम से आ जाएंगे। तुम बता रही थी झोपड़ी की टाटी पर नेनुआ लगाया था, वो तो बड़े हो गए होंगे? उसमें अब तो नेनुआ भी आ गया होगा? माँ कुछ नेनुआ बचा कर रखना तेरे हाथ की नेनुआ की सब्ज़ी खानी है । यहां शहर का नेनुआ तो पता नहीं कैसा होता है ग़लता ही नहीं। मां मेरे आम के पेड़ में तो टिकोरे भी आ गए होंगे। देखना सब छुटकी सब खा ना जाए। उसको बोलना बचा कर रखेगी मेरे लिए भी।

मां पता है आज हमने 250 किलोमीटर का रास्ता पूरा कर लिया। पर पैर दुःख गए । आज कोई कह रहा था सरकार बस चलने वाली है सो हम बस स्टैंड पर चले गए। । पर वही ग़लती हो गयी पुलिस ने बहुत मारा। हम भाग तो गए पर सर पर गठरी थी इस लिए तेज़ नहीं भाग पा रहे थे। पर कोई बात नहीं अब एक बड़ी सी पुलिया मिल गयी है सब लोग उसी में छुप कर बैठ गए हैं। सड़क पर सायरन बजाती पुलिस की गाड़ियों की आवाज़ आ रही है। हम तो पुलिया के अंदर घुस के बैठे है। मां जब थोड़ा अंधेरा हो जाएगा तो फिर चलना शुरू करेंगे।

मां कही कोई पोस्ट बॉक्स नहीं मिला इसलिए मेरी चिट्ठी बढ़ती जा रही है सब अब इकठ्ठे ही भेजूंगा। जहां भी पोस्ट ऑफ़िस मिल जाएगा। छुटकी तुम्हें पढ़ के सुना देगी मां पता है मैंने छुटकी के लिए ज्योमेटरी बॉक्स लिया है, और उसके लिए पांच फ़्राक लिया है लाल, पीला ,हरा, एक सफ़ेद और नीला प्रिंट है। एक गुलाबी और सफ़ेद प्रिंट वाला भी है। पर मां उसको सब एक साथ नहीं देंगे। हम लोग हर महीने एक-एक देंगे ताकि वो भी अपनी कक्षा की अमीर लड़की लगे। मां मैंने बाबू जी के लिए एक पम्प जूता और एक गमछा भी खरीदा है। बाबू जी के पैरों में बहुत बिवाई आ गयी थी मैंने देखा था। जूता पहनेंगे तो तो बिवाई कम हो जाएगी।

मां तुम्हारी साड़ी फट गयी थी इसीलिए बिग बाज़ार से दो साड़ी ले ली।

अब ग़ुस्सा मत होना बहुत पहले ले ली थी कोई आने वाला नहीं था इस लिए भेज नहीं पाया सो साथ ही लेकर आ रहा हूं।

आज चार दिन हो गए चलते चलते, पता नहीं क्‍यों सांस फूल रही है। दो दिन से खाने का सामान भी ख़त्म हो गया है। सुल्तानपुर पहुंचने वाले हैं। पैसे तो है पर कही रास्ते में कुछ मिल ही नहीं रहा। हैंडपम्प पर पानी मिल जाता है वही बोतल में भर लेते है। संतोष भैया के पास कुछ बिस्कुट पड़े थे पर उनके साथ बच्चे है इसलिए मैंने नहीं खाया उनके बेटे शास्वत को दे दिया। पर मां अब शरीर गवाही नहीं दे रहा है। क़दम आगे नहीं बढ़ रहे है। मां तुम कल सुबह कुछ बना कर रखना। बहुत भूख लगी है। आज पहली बार महसूस हुआ कि शहर जा कर ग़लती की, तुम्हारी रोटी, और डांट बहुत याद आ रही है। वो तुम्हारा सुबह-सुबह बासी सब्ज़ी और रोटी अपने हाथ से खिलाना बहुत याद आ रहा है। मां मेरी सांसे उखड़ रही है, अब बिलकुल नहीं चला जा रहा है।

पर चलना तो है ही। तुम्‍हारी साड़ी, बाबू जी के जूते और छुटकी का फ़्राक उन तक पहुंचाना है।

फिर चल पड़ा हूं। पर दस क़दम चला पर नहीं चला जा रहा है। पेड़ के नीचे बैठ गया हूं। मां मुझे ढेर सारे तारे नज़र आ रहे है । मुझे मेरी फ़ैक्टरी का लाल-लाल लोहा दिख रहा है। छुटकी दिख रही है तुम दिख रही हो तुम्हारा आंचल दिख रहा है। बाबू जी के पैर की बिवाई दिख रही है। मां मुझे कुछ हो रहा है। मेरी गठरी मेरे सिर के नीचे है।

मैं कहां हुं? नहीं यही तो हूं। चिकोटी काटी तो पता चला ना सो रहा हुं ना बेहोश हुं। यह तो मीलों चलने के कारण पैरों में थकान है। पता नहीं क्या हो रहा है। सो जाता हुं मां शायद मैं अधिक थक गया हूं। बाक़ी कल लिखूंगा।

मैं भी पागल हुं। कल तो मैं तुम्हारे पास ही पहुंच जाऊंगा। इस चिट्ठी से पहले अब क्या लिखूंगा। अब तो मैं पहुंच कर तुम्हें अपने सफ़र और परदेसी होने की त्रासदी ख़ुद सुनाउंगा। मां अब सो जाता हुं। कल सुबह तेरे परदेसी की गठरी तेरे पास होगी। पर तुम मत उठाना। छुटकी को उठाने देना थोड़ी भारी है। सो जाता हुं। मां कल मिलता हुं । नेनुआ की सब्ज़ी और आम के टिकोरे की चटनी बना कर रखना।

चिठ्ठी खत्‍म हो गयी है।

छुटकी कुछ सोच रही है।

सही कह रहे थे भइया, बहुत भारी गठरी है। इस गठरी में आयातित महामारी, सत्ता द्वारा सृजित महापलायन की त्रासदी है। पैरों में पड़े छालों का दर्द है, इस गठरी में अपने घर से दूर एक मजदूर के पेट की भूख और प्यास है। सिर्फ इतना ही गठरी में अपनी ज़िम्मेदारी ना पूरा कर पाने की टीस है। जीवन के सपनो के अधूरे रह जाने की कसक है। मां बाबूजी की पहाड़ सी ज़िंदगी में बेटे के खोने का दर्द भी तो है। इस गठरी में एक बहुत प्यार करने वाले भाई का अपनी बहन को नर्स ना बना पाने की कुंठा भी है। सचमुच बहुत भारी गठरी है भइया।

इस गठरी का बोझ तो मेरे जीवन पर हमेशा रहेगा। छुटकी सोच रही है कि काश उसका भइया परदेस ना गया होता। काश यह सत्ता सृजित अव्‍यवस्‍था का यह महा पलायन ना आया होता। काश यह महामारी ना आयी होती। काश यह गठरी ना आयी होती आप आए होते। इसी सोच में सुद्धक का घंट फूट गया है। सुरेश के बाबू जी के बालों का मुंडन हो गया।

परदेसी की गठरी अभी भी झोपड़ी के एक कोने में पड़ी है। बहुत भारी है। कोई नहीं उठा रहा इस गठरी को। यह गठरी ग़रीब के और ग़रीब होने का, सत्ता को उसके बेरहम होने का, प्रकृति को उसके इस विश्वव्यापी महामारी के कारण होने का और मानव के इंसान ना होने का एहसास दिलाती रहेगी। यह गठरी हमारी सत्तर साल की असफलता, स्वार्थ और संकुचित सोच का स्मारक बनेगी। और हमें सदियों बाद याद दिलाएगी कि इस भारी गठरी का सृजन व्‍यवस्‍था द्वारा सृजित अव्‍यवस्‍था के महापलायन से हुआ था।

यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक कमर्शियल पायलट होने के साथ ही एक इंटरप्रेन्योर हैं। पत्रकारिता में भी लंबे समय तक जुड़ें रहें।

शलभ प्रताप सिंह

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-Adv-

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