World Press Freedom Day – क्या है विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस का महत्व ?

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पूरे विश्व में 3 मई 1997 को प्रेस की स्वतंत्रता के महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाने और सरकारों को उनके कर्तव्य की याद दिलाने के लिए सम्मान और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को बनाए रखने के लिए बाध्य किया गया था।

भारत में अक्सर प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर चर्चा होती रहती है। 3 मई को मनाए जाने वाले विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर भारत में भी प्रेस की स्वतंत्रता पर बातचीत होना लाजिमी है। आज प्रेस दुनिया भर खबरें पहुंचाने का सबसे बेहतरीन माध्यम है। भारत में प्रेस की स्वतंत्रता भारतीय संविधान के article-19 में भारतीयों को दिए गए अभिव्यक्ति की आजादी के मूल अधिकार से सुनिश्चित होती है।

George Orwell

आपको को बता दें कि Press Freedom day के इस मनोहर अवसर पर हर साल Guillermo Cono वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम प्राइज भी दिया जाता है। यह पुरस्कार उस व्यक्ति अथवा संस्थान को दिया जाता है जिसने प्रेस की स्वतंत्रता के लिए उल्लेखनीय कार्य किया हो। देखने वाली चीज़ है कि इस बार मीडिया पेशेवरों के एक स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जूरी की सिफारिश पर कोलंबियाई इनवेस्टिगेटिव पत्रकार जिनेथ बेदोया लीमा को 2020 यूनेस्को / गिलर्मो कैनो वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम प्राइज के विजेता के रूप में नामित किया गया है।

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इस बार की गुरेलिमो अवार्ड की विजेता-

1974 में जन्मी, जेनेथ बेदोया लीमा की रिपोर्टिंग ने कोलंबिया में सशस्त्र संघर्ष और शांति प्रक्रिया और महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा पर ध्यान केंद्रित किया है। सुश्री बेदोया लीमा खुद 2000 में यौन हिंसा का शिकार हुई थीं, जब उन्हें हथियारों की तस्करी की जांच के सिलसिले में अपहरण और बलात्कार किया गया था, जब वह एक एक दैनिक अख़बार El Espectador के लिए काम कर रही थी। फिर तीन साल बाद जब वो EL Teimpo के लिए काम कर रही थी तब उन्हें कोलंबिया के एक क्रांतिकारी मिलिटेंट्स ग्रुप द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया था। यक़ीनन मिस जेनेथ साहसी और पत्रकारिता के क्षेत्र में बहादुरी की मिसाल है।

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भारत में आजतक किसी को नहीं मिला ये अवार्ड-

सोचने में आश्चर्यजनक है लेकिन सच्चाई से मुंह नहीं फेरा जा सकता है। 1997 से अब तक भारत के किसी भी पत्रकार को यह पुरस्कार नहीं मिलने की एक बड़ी वजह कई वरिष्ठ पत्रकार पश्चिम और भारत में पत्रकारिता के मानदंडों में अंतर को बताते हैं। भारतीय पत्रकारित में हमेशा विचार हावी होता है, जबकि पश्चिम में तथ्यों पर जोर दिया जाता है। इससे कहीं न कहीं हमारे पत्रकारिता के स्तर में कमी आती है।

इसके अलावा भारतीय पत्रकारों में पुरस्कारों के प्रति जागरूकता की भी कमी है, वे इसके लिए प्रयास नहीं रहते। प्रेस किसी भी समाज का आईना होता है। प्रेस की आजादी से यह बात साबित होती है कि उस देश में अभिव्यक्ति की कितनी स्वतंत्रता है। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में प्रेस की स्वतंत्रता एक मौलिक जरूरत है। प्रेस और मीडिया हमारे आसपास घटित होने वाली घटनाओं से हमें अवगत करवा कर हमारे लिए खबर वाहक का काम करती हैं, यही खबरें हमें दुनिया से जोड़े रखती हैं।

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2020 थीम: Fear या Favor के बिना पत्रकारिता-

UNESCO दुनिया भर में मीडिया और सोशल मीडिया चैनलों के माध्यम से एक ग्लोबल कैंपेन की शुरुवात कर रही है जिसका मेन फोकस “Journalism without Fear and Favor” होगा, जिस पत्रकारिता की छाप विश्व के हर कोने में पहुंचाने का संकल्प इस कैंपेन का एक हिस्सा है। 1993 से प्रतिवर्ष आयोजित, ग्लोबल कॉन्फ्रेंस पत्रकारों, नागरिक समाज के प्रतिनिधियों, राष्ट्रीय अधिकारियों, शिक्षाविदों और व्यापक जनता को स्वतंत्रता और पत्रकारों की सुरक्षा के लिए उभरती चुनौतियों पर चर्चा करने और समाधान की पहचान करने के लिए एक साथ काम करने का अवसर प्रदान करती है।

2020 के कांफ्रेंस का होस्ट नेदरलॅंड्स है। इस वर्ष के उप-विषय हैं:
महिला और पुरुष पत्रकारों और मीडियाकर्मियों की सुरक्षा
स्वतंत्र और व्यावसायिक पत्रकारिता राजनीतिक और वाणिज्यिक प्रभाव से मुक्त
मीडिया के सभी पहलू में लैंगिक समानता

हालांकि विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा COVID-19 को वैश्विक महामारी घोषित करने के निर्णय के मद्देनजर सम्मेलन में शामिल होने के लिए लागत और जोखिम को कम करने के लिए सम्मेलन को स्थगित करने का निर्णय लिया गया है।

प्रेस की आजादी और समाचारों को लोगों तक पहुंचाकर, सशक्त हो रहे मीडियाकर्मियों का व्यापक विकास करना इसका उद्देश्य होना चाहिए।

यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक जी मीडिया में कार्यरत हैं।

गौरव द्विवेदी पत्रकार

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-Adv-

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