सरकारें किसी दल की नहीं, देश की होती हैं

ध्रुव गुप्त

कश्मीरी पिछले सत्तर साल से हमारे कानूनी भाई थे, आज हमारे सगे भाई हुए। कश्मीर जो अब तक भारत का शोपीस था, आज भारत का मुकुट बना।

उम्मीद है कि कश्मीर घाटी से आतंक और अलगाववाद की दुकानदारी ख़त्म होगी। मुट्ठी भर सियासी परिवारों की इज़ारेदारी और उनके द्वारा संसाधनों की लूट पर लगाम लग सकेगी। वहां के गरीब नागरिकों के लिए विकास और रोजगार के नए-नए दरवाज़े खुलेंगे।

वहां के नागरिकता कानून में विसंगति की वजह से छह दशकों से बिना किसी अधिकार के शरणार्थियों का जीवन जी रहे लाखों लोगों को बराबरी का दर्ज़ा मिलेगा। कश्मीरी पंडितों की घाटी में वापसी की प्रक्रिया शुरू होगी। प्रदेश के बाहर शादी करने वाली कश्मीर की बेटियों को अपनी पैतृक संपत्ति में उनका जायज़ अधिकार हासिल हो सकेगा।

भाजपा सरकार से तमाम वैचारिक असहमतियों के बावज़ूद इस साहसिक फ़ैसले के लिए उसकी तारीफ़ की जानी चाहिए ! जिन लोगों को आज कश्मीरियत पर ख़तरे की आशंका दिख रही है, उनसे यह सवाल पूछना चाहिए कि क्या भारत में बिना शर्त विलय से बंगाल,असम, पंजाब, गुजरात या दक्षिण भारतीय राज्यों की अलग पहचान मिट गई है ?

समस्या सिर्फ यह है कि धारा 370 के छद्मलोक में जीने के आदी हमारे ज्यादातर कश्मीरी भाईयों को इस नई व्यवस्था से सामंजस्य स्थापित करने में बहुत मुश्किल होगी। प्रदेश के आमजन को विश्वास में लेना और देश की मुख्यधारा से भावनात्मक तौर पर उन्हें जोड़ने का काम बाकी है। भारत सरकार या कश्मीर का प्रशासन इस काम में किस हद तक सफल हो पाएगा, यह देखना अभी बाकी है।

विचार और बहस का असली मुद्दा इस समय यह होना चाहिए कि जिस प्रकार कश्मीर के चुने हुए प्रतिनिधियों को हाउस अरेस्ट करके, भारी संख्या में फौज भेज कर, कश्मीरी लोगों को विश्वास में लेने की जगह उन्हें आतंकित करके तथा देश की तमाम राजनीतिक पार्टियों को विश्वास में लिए बिना जिस तरह से यह कार्रवाई की गयी है, उसे क्या किसी भी तरह से जनतांत्रिक कहा जा सकता है?

(ये लेखक के निजी विचार हैं।)