5 मिनट की इस लीला को देखने के लिए पहुंचती है लाखों की भीड़

धर्म की नगरी काशी में लक्खी मेले में शुमार भरत मिलाप का आयोजन बुधवार की शाम को किया जाएगा। सिर्फ पांच मिनट की इस लीला को देखने के लिए देश के कोने कोने से लोग पहुंचते हैं। लाखों की भीड़ भाईयों के इस मिलाप को देखने के लिए घंटों इंतजार करती है। नवरात्र और दशहरा के बाद रावण दहन के ठीक दूसरे दिन यहां विश्व प्रसिद्ध भरत मिलाप का उत्सव भी काफी धूम धाम से मनाया जाता है।

शहर में इस पर्व का आयोजन कई अलग अलग स्थानों पर होता है लेकिन चित्रकूट रामलीला समिति द्वारा आयोजित ऐतिहासिक भरत मिलाप को देखने के लिए नाटी इमली स्थित भरत मिलाप मैदान में लाखो के भीड़ उपस्थित रहती है। इस मेले का शुमार भी काशी के लक्खी मेलों में है।

लगभग पांच सौ वर्ष पहले संत तुलसीदास जी के शरीर त्यागने के बाद उनके समकालीन संत मेधा भगत काफी विचलित हो उठे। मान्यता है की उन्हें स्वप्न में तुलसीदास जी के दर्शन हुए और उसके बाद उन्ही के प्रेरणा से उन्होंने इस रामलीला की शुरुआत की, असत्य पर सत्य की जीत का पर्व होता है दशहरा। इस पर्व के दूसरे दिन एकादशी के दिन काशी के नाटी इमली के मैदान में होता है भरत मिलाप।

लंका में रावण पर विजय प्राप्त करने के बाद मर्यादा पुरषोत्तम राम जब वापस लौटते है राम लक्ष्मण और भरत शत्रुघ्न के मिलाप को भरत मिलाप कहा जाता है। मान्यता ऐसी है की 473 वर्ष पुरानी काशी की इस लीला में भगवान राम स्वय धरती पर अवतरित होते है।

कहा ये भी जाता है की तुलसी दास जी ने जब रामचरित मानस को काशी के घाटों पर लिखा उसके बाद तुलसी दास जी ने भी कलाकारों को इकठ्ठा कर लीला यहा शुरू किया था। मगर उसको परम्परा के रूप में मेघा भगत जी ने ढ़ाला।

मान्यता ये भी है की मेघा भगत को इसी चबूतरे पर भगवान राम ने दर्शन दिया था तभी से काशी में भरत मिलाप शुरू हुआ।इस मेले को लक्खी मेल भी कहा जाता है। काशी की इस परम्परा में लाखों का हुजूम उमड़ता है भगवान राम, लक्ष्मण माता सीता के दर्शन के लिए शहर ही नहीं अपितु पूरे संसार के लोग उमड़ पड़ते है।

गौरतलब है कि बिना काशी नरेश के लीला स्थल पर आये लीला शुरू नहीं होती सबसे पहले महाराज बनारस लीला स्थल पर पहुंचते है। इस परंपरा का निर्वाह काशी नरेश सदियों से करते चले आ रहे है।

 

 

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