महामारी और किसानों की मुश्किलें

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नए कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण के कारण देश की हर सड़क और गांव के हर चौपाल सूने हो गए हैं। अगर यह महामारी देहात में पसरी, तो इसे संभालना मुश्किल हो जाएगा। यह इसका तीसरा स्टेज होगा, जिसे रोकने की हरसंभव कोशिशें हो रही हैं। केंद्र सरकार ने इसी वजह से पूरे देश में 21 दिनों के लॉकडाउन की घोषणा की है। मगर कोरोना संक्रमण के प्रसार को रोकने की इस अहम कवायद ने हमारे अन्नदाताओं के सामने कठिन मुश्किलें पैदा कर दी हैं। क्या हमें यह अंदाजा भी है कि जो किसान पूरे देश को खिलाता है, आज खुद उसके पास अपने खाने के लिए कितना अनाज है?

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देश के 85 प्रतिशत किसानों के पास तीन एकड़ से भी कम जमीन है, और फसल से कमाए गए उनके पूरे पैसे ब्याज समेत कर्ज लौटाने में ही खर्च हो जाते हैं। अनाज पैदा करने के बावजूद किसान आम दिनों में मजदूरी करते दिखते हैं। ऐसे में, अब जब 21 दिनों तक सबको घर में सुरक्षित रहने को कहा गया है, तो विशेषकर छोटे व मंझोले किसानों और मजदूरों के घरों में राशन पहुंचाना अनिवार्य किया जाना चाहिए।

अभी हर कोई कोविड-19 से बचने की जद्दोजहद कर रहा है, लेकिन किसान अपनी फसल और देशवासियों के लिए जरूरी खाद्यान्न के बारे में सोच रहा है। लिहाजा, हमें भी किसानों के बारे में सोचना चाहिए। ज्यादा दिन नहीं बीता है कि देश के उत्तरी हिस्से में ओलावृष्टि के कारण सरसों, मसूर आदि की फसल तबाह हो गई। इसी तरह, खेतों में खड़ी गेहूं और रबी की अन्य फसलों की कटाई भी 21 दिनों की देशबंदी के खत्म होने से पहले शुरू करने की मजबूरी है। ऐसे में, किसान असमंजस में होंगे कि अगर वे फसल हाथ से कटवाते हैं, तो मजदूरों में कोरोना वायरस फैलने का खतरा होगा, और अगर इस काम के लिए ‘कंबाइन हार्वेस्टर’ जैसी मशीनों की मदद ली जाती है, तो उन्हें मवेशियों के लिए चारा (भूसा) नहीं मिलेगा। ऐसा इसलिए, क्योंकि ‘कंबाइन हार्वेस्टर’ से गेहूं की कटाई के बाद भूसा निकलवाने से किसानों को दो तरह के घाटे होते हैं- एक, कटाई का खर्च बढ़ जाता है और दूसरा, सामान्य कटाई की तुलना में इसमें भूसा 60 फीसदी तक कम निकलता है। लिहाजा, भूसे के लालच में फसलें हाथों से न कटवाई जाएं, इसलिए सरकार द्वारा किसानों को राहत की घोषणा करनी चाहिए। मसलन, मशीनों से फसल-कटाई कराने पर 100 रुपये प्रति क्विंटल के अनुदान की घोषणा यदि सरकार करती है, तो किसान मजबूरी में अपनी फसल मजदूरों से कटवाने से बचेंगे। इसके अलावा, गेहूं की फसल को खरीदने और उसका भुगतान तत्काल करने का काम भी बहुत जरूरी है। चूंकि अब मंडी बंद हो चुकी है, इसलिए यह खरीदारी खेतों से ही होनी चाहिए और किसानों को जल्द ही इसका भुगतान भी होना चाहिए।

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पिछले महीने हुई ओलावृष्टि की मार से उबरने के लिए भी किसानों को मदद की दरकार है। इस नुकसान की भरपाई बीमा कंपनियों से कराने या सरकार द्वारा अपने स्तर पर करने की व्यवस्था होनी चाहिए। जिस तरह से कोरोना वायरस का संक्रमण बढ़ता जा रहा है, जरूरी यह भी है कि किसानों से कर्ज वसूली को अगले छह महीने तक टाल देना चाहिए और इन छह महीनों का ब्याज भी माफ किया जाना चाहिए।

लोगों को मालूम होना चाहिए कि इस समय पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में किसान गेहूं काटकर गन्ने की बुआई करते हैं। जिन इलाकों में सरसों, मसूर आदि की फसलें खराब हो गई हैं, वहां भी किसान गन्ना लगाने की तैयारी कर रहे हैं। जाहिर सी बात है कि किसानों को इस वक्त नगदी चाहिए। इसलिए गन्ने का बकाया पैसा यदि चीनी मिलें उनको दे दें, तो अभी उनका गुजारा हो जाएगा। इसके लिए सरकार को पूरी ईमानदारी और गंभीरता दिखानी होगी।

पिछले दिनों उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से बताया गया कि राज्य के गन्ना किसानों को 92,312 करोड़ रुपये दिए जा चुके हैं, जो कि ऐतिहासिक है। लेकिन वास्तव में सूबे की सभी चीनी मिलों ने मिलकर 8,107 लाख क्विंटल गन्ने की पेराई ही की, जिसकी कुल भुगतान राशि 23,482 करोड़ रुपये है। इसमें से भी सिर्फ 13,866 करोड़ रुपये किसानों को दिए गए हैं, जबकि शेष 9,616 करोड़ रुपये का भुगतान बाकी है। पिछले 50 वर्षों में एक साल को छोड़ प्रदेश की चीनी मिलों ने 30,000 करोड़ रुपये से ऊपर की पेराई की ही नहीं है। ऐसे में, संभव है कि मौजूदा राज्य सरकार ने पिछले तीन-चार साल के आंकड़ों को जोड़कर कुल रकम बताई हो। एक सच यह भी है कि अदालत के आदेश के बावजूद किसानों को भुगतान में देरी होने पर उसकी ब्याज राशि नहीं दी जा रही। अभी अगर ब्याज सहित बकाए का भुगतान कर दिया जाता है, तो कोरोना के कारण पैदा हालात से लड़ने में किसान कहीं ज्यादा सक्षम होंगे। हम यह न भूलें कि यदि संक्रमण के डर से किसान अपने-अपने घर में बैठ गए, तो अगले साल देशवासियों की खाद्यान्न-जरूरतों को पूरा करना मुश्किल हो जाएगा।

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(यह लेखक के अपने विचार हैं, यह लेख हिंदुस्तान अखबार में प्रकाशित है।)

वी एम सिंह संयोजक, अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति

 

पिछले कुछ वर्षों में यह देखने को मिला है कि देहात के 90 प्रतिशत नौजवान खेती से बचना चाहते हैं, क्योंकि यह अब मुनाफे का सौदा नहीं है। वे नौकरी की तलाश में गांव से निकले तो थे, पर नोटबंदी के बाद उनमें से कई वापस लौट आए। मजदूर भी रियल एस्टेट सेक्टर के सुस्त होने से घर आ गए हैं। रहे-बचे नौजवान व मजदूर जनता कफ्र्यू के बाद से बड़ी संख्या में वापस लौट रहे हैं। लिहाजा, शहरों में बेशक कोरोना का संक्रमण तेजी से न फैले, मगर गांवों में इसका प्रसार तेजी से हो सकता है। इसलिए घर लौटे प्रवासियों की जांच-पड़ताल बहुत आवश्यक है। इसके बाद कोशिश यह होनी चाहिए कि इनके रोजगार की व्यवस्था गांवों में की जाए। इसके लिए खेती-बाड़ी की स्थिति को बेहतर बनाने से अच्छा कुछ नहीं है। तो क्या हम यह उम्मीद पालें कि पहले हम कोरोना वायरस से अपनी जंग जीतेंगे और उसके बाद खेती को जिंदा करेंगे, ताकि अन्नदाताओं की मुश्किलों का अंत हो और ग्रामीण नौजवानों को आजीविका मिले?

-Adv-

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