रेप में फांसी से ही कम होगा यह अपराध

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सात साल से भी ज्यादा लंबी कानूनी जद्दोजहद के बाद आखिरकार निर्भया Nirbhaya के चार बलात्कारियों को फांसी हो ही गई। इसी के साथ भारतीय न्याय-व्यवस्था के प्रति फिर विश्वास बढ़ा कि यहां देर जरूर होती है, पर अंधेर नहीं होता। हालांकि पिछले कुछ समय से दोषियों के वकील नए-नए कानूनी दांव-पेचों का इस्तेमाल करते हुए कई बार फांसी टलवाने में कामयाब हो गए थे। उससे यह आशंका भी थी कि कहीं चारों दोषी फांसी से बच तो नहीं जाएंगे, पर निर्भया को इंसाफ मिल ही गया।

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इंसाफ की लड़ाई

आज पूरे विश्व में बलात्कार का फैलाव एक खतरनाक वायरस की तरह हो रहा है। भारत में ही अब हर घंटे में 5 बलात्कार हो जाते हैं। लेकिन निर्भया Nirbhaya बलात्कार कांड इस तरह के अन्य मामलों से काफी अलग रहा।यह मामला कई संदेश देता है और सबक भी सिखाता है। देश में अभी तक बलात्कार और हत्या के हजारों मामलों में सिर्फ तीन बार अपराधियों को फांसी हो सकी है, जिनमें दो मामले दिल्ली के ही हैं। पहला वह, जब 26 अगस्त 1978 को एक भारतीय नौसेना अधिकारी के नाबालिग बच्चों गीता चोपड़ा और संजय चोपड़ा के अपहरण, बलात्कार और हत्या का केस हुआ। तब इनके दोषी बिल्ला और रंगा को करीब साढ़े तीन साल बाद 31 जनवरी 1982 को फांसी दे दी गई।

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दूसरा मामला कोलकाता का है जहां 5 मार्च 1990 को 15 साल की हेतल पारिख की बिल्डिंग के चौकीदार धनंजय चटर्जी ने रेप के बाद हत्या कर दी थी। धनंजय को उसके कुकर्म के करीब 14 साल बाद,14 अगस्त 2004 को फांसी हो सकी। इन दोनों मामलों के बाद निर्भया Nirbhaya बलात्कार-हत्या केस में गत 20 मार्च को मुकेश, अक्षय, विनय और पवन को फांसी हुई है। तिहाड़ जेल के इतिहास में यह पहला मौका था जब एक साथ चार अपराधियों को फांसी दी गई। गौरतलब है कि 16 दिसंबर 2012 की रात को निर्भया के साथ 6 लोगों ने सामूहिक बलात्कार किया था। घटना के कुछ ही दिनों बाद निर्भया की मौत हो गई। बलात्कारियों में से एक पर नाबालिग होने के कारण जूवेनाइल के तहत मामला चला और एक ने जेल में खुदकुशी कर ली। इस मामले ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। एक स्वर से पूरे देश ने बलात्कारियों के लिए फांसी की मांग की। यह केस ‘फास्ट ट्रैक’ अदालत में गया।

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जिन देशों में बलात्कार के मामलों के त्वरित निपटारे और मृत्यु दंड का प्रावधान है वहां यौन शोषण की घटनाएं कम होती हैं

अदालत ने 9 महीने बाद ही इन चारों को दोषी पाते हुए 13 सितंबर 2013 को फांसी की सजा सुना दी थी। फिर भी लचीले कानून का लाभ लेकर दोषी साढ़े छह साल का जीवनदान पा गए। इस केस में भारी जनदबाव के कारण बलात्कार के कानून को सख्त बनाया गया। आईपीसी की धारा-376 ए के तहत प्रावधान किया गया कि अगर रेप के कारण महिला वेजिटेटिव स्टेज (मरने जैसी स्थिति) में चली जाए, तो दोषी को अधिकतम फांसी की सजा हो सकती है। सरकार ने स्त्री की सुरक्षा को लेकर कई नई व्यवस्थाएं कीं पर दुर्भाग्य से रेप पर रोक नहीं लग पा रही। उल्टे ऐसे मामले बढ़ते ही जा रहे हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार 2012 में जहां महिलाओं के साथ दुष्कर्म के 24,923 मामले दर्ज हुए, वहीं 2013 में ही यह संख्या 33,707 और 2018 में 38,947 हो गई। अनुमान है कि अभी यह संख्या 40 हजार के आसपास पहुंच गई है।

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बलात्कार की बढ़ती घटनाओं का कारण यह भी माना जाता है कि इस तरह के मामलों में धारा 376 में अपराध सिद्ध होने पर 5 से 10 साल की कैद ही होती रही है। इतनी सजा दिलाने में भी बरसों निकल जाते हैं। फिर कई कारणों से बलात्कार के अधिकतर मामले दर्ज भी नहीं हो पाते। यह समस्या भारत तक ही सीमित नहीं है। विदेशों में भी महिलाओं के साथ यौन शोषण पर नजर डालें तो अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, स्वीडन, फ्रांस, जर्मनी और न्यूजीलैंड जैसे विकसित देशों में स्थितियां कमोबेश ऐसी ही हैं। दक्षिण अफ्रीका तो ‘रेप कैपिटल’ ही है जहां हर साल 4 लाख से अधिक महिलाएं बलात्कार का शिकार होती हैं। ‘अफ्रीकी मेडिकल रिसर्च काउंसिल’ के अनुसार वहां 9 में से सिर्फ एक महिला ही रेप की रिपोर्ट दर्ज कराती है।

यूएस टुडे के अनुसार अमेरिका में हर साल करीब 3 लाख ऐसे मामले आते हैं। अमेरिकी संस्था ‘रेप असॉल्ट एंड इंसटेंट नेशनल नेटवर्क’ की मानें तो वहां एक हज़ार यौन उत्पीड़न की घटनाओं में करीब 310 मामले ही पुलिस तक पहुंच पाते हैं। जबकि इनमें सजा सिर्फ 6 लोगों को ही मिल पाती है। उधर ब्रिटेन में भी प्रति वर्ष 85 हजार महिलाएं यौन अपराधों का शिकार बनती हैं। जबकि कुल घटनाओं में सिर्फ 15 प्रतिशत केस ही दर्ज हो पाते हैं। फ्रांस में भी हालात ऐसे ही हैं। जबकि जिन देशों में बलात्कार के मामले में फांसी और उससे पहले और भी कई सख्त सजाएं हैं, साथ ही ऐसे मामलों के त्वरित निपटारों की व्यवस्था है, वहां यौन शोषण की घटनाएं काफी कम होती हैं। इनमें यूएई, सऊदी अरब, उत्तर कोरिया, इराक, चीन और पोलैंड जैसे देश शामिल हैं।

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(यह लेखक के अपने विचार हैं, यह लेख NBT अखबार में प्रकाशित है।)

प्रदीप सरदाना

पिछले कुछ बरसों में भारत में यौन उत्पीड़न और हत्या के मामलों मे आसाराम, नारायण साईं और राम रहीम जैसे ‘विख्यात बाबा’ और कुलदीप सिंह सेंगर जैसे नेता भी उम्र कैद की सजा से बच नहीं सके, जो बताता है कि भारत में रसूखदार व्यक्ति भी देर सवेर कानून के शिकंजे में आ सकते हैं। लेकिन यहां एक कमजोर पहलू यह है कि जनवरी 2018 तक ही यौन उत्पीड़न के करीब एक लाख 30 हजार केस अदालतों में लंबित थे।

 

 

सख्ती का डर

कानूनी दांव-पेच और अदालतों में बहुत अधिक केस लंबित होने से बलात्कारियों के हौसले बढ़ते हैं, इसीलिए उम्मीद है कि निर्भया Nirbhaya केस में चार दोषियों को एक साथ फांसी की सजा के बाद अपराधियों के भीतर खौफ बढ़ेगा। यह बात उन्हें रेप करने से रोकेगी कि इसमें सजा-ए-मौत भी मिल सकती है।

-Adv-

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