लॉकडाउन: गांवों को संकट से उबारने के लिए

लॉकडाउन की घोषणा के बाद जो लोग अपने गांव लौट आए हैं, अब वे वहां करेंगे क्या? नए अवसरों के जरिए इन्हें इनकी जड़ों से जोड़ा जाना चाहिए।

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लॉकडाउन ने कुछ चीजों को पीछे खिसका दिया है। उत्तर भारत में गेहूं की खरीद इस वक्त जोरों पर होनी चाहिए थी। हालांकि इस बार मौसम कुछ मेहरबान है। गरमी तेज नहीं हुई है, इसलिए कुछ राहत है। पंजाब ने खरीद की तारीख बढ़ाकर 15 अप्रैल और हरियाणा ने 20 अप्रैल कर दी है।

मध्य प्रदेश और गुजरात से, जहां फसल जल्दी आ जाती है, और मार्च में ही सरकारी खरीद शुरू हो जाती थी, अभी तक कुछ खबर नहीं है। उत्तर प्रदेश में भी 1 अप्रैल से खरीद शुरू हो जानी थी, मगर लॉकडाउन के बीच वहां भी काम शुरू होने की कोई खबर नहीं है। जिन किसानों के परिवार में काम करने वाले लोग हैं, वे तो फसल काट पा रहे हैं, लेकिन जो मजदूरों के भरोसे थे, उनके लिए मुश्किल खड़ी हो गई है।

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ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर नजर रखने वालों का कहना है कि गांवों के कई परिवारों का कोई न कोई सदस्य शहर में था और वक्त-जरूरत वहां से पैसे भी भेज दिया करता था। अब जो भगदड़ मची, तो लोग शहरों से भागकर या तो गांव पहुंच गए हैं या फिर रास्ते में कहीं अटके हैं। अब तो वे खुद ही गांव की अपनी खेती-बाड़ी के भरोसे लौट रहे हैं। भारतीय किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष चौधरी पुष्पेंद्र सिंह का कहना है कि सबसे खराब हाल इस वक्त दूध कारोबारियों का है। गांवों के कुल कारोबार में 30 फीसदी पशुपालन, यानी मुख्यत: दूध का कारोबार है।

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लॉकडाउन के बाद शहरों में दूध की मांग 30 से 35 फीसदी कम हो गई है। चाय की दुकानें बंद हैं, मिठाई की दुकानें बंद हैं, और सरकारी से लेकर प्राइवेट डेयरी तक की खरीद में गिरावट आई है। हालांकि देश में दूध की नदियां बहाने वाले अमूल ने इस वक्त किसानों को सहारा देनेके लिए दूध का खरीद-मूल्य बढ़ाया है, लेकिन उसके अलावा सभी ने दाम गिरा दिए हैं। शुरुआत मदर डेयरी ने की थी और फिर प्राइवेट डेयरी वालों ने भी वही रास्ता पकड़ लिया।

इस मुसीबत का दूसरा सिरा यह है कि जानवरों का चारा महंगा हो गया। फैक्टरियां बंद होने की वजह से खली, चूरी, बिनौला और छिलका प्रोसेस होना बंद है, इसलिए फीड का मिलना मुश्किल है और उसके दाम भी चढ़ गए हैं। मजबूरी में किसान कम चारा डाल पा रहे हैं, तो भैंस ने भी दूध देना कम कर दिया है। जो लोग मुरगी और अंडे का कारोबार करते थे, उन पर पहली मार तो इस अफवाह से पड़ी कि इससे कोरोना फैल सकता है और उसके बाद नवरात्रि आ गई। ट्रांसपोर्टेशन में भी बड़ा संकट है।

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यही हाल सब्जियों का है। फसल अच्छी है, मगर तोड़नेके लिए मजदूर नहीं हैं। मजदूर आ भी जाएं, तो फसल बाजार तक कैसे जाए? ऐसे में, उस किसान का हाल सोचिए, जो छह महीने में एक बार फसल बेचता है और इस वक्त इंतजार कर रहा था कि फसल कटे, खरीद हो, और भुगतान मिले। बहुत से किसान तो खेत से फसल सीधे मंडी पहुंचा देते हैं या व्यापारी को बेच देते हैं। इस वक्त वह फसल भी फंस गई है।

अब ऐसे किसानों को बोरे खरीदने होंगे, पैकिंग और स्टोरेज पर खर्च करना पडे़गा। उसके बाद क्या होगा, पता नहीं। खेत से बाजार तक माल पहुंचाने वाली चेन फिलहाल बंद पड़ी है।

पहला रास्ता एकदम साफ और सीधा है। सरकार ट्रकों की आवाजाही खोल दे। जल्दी से जल्दी। बेशक नियम-कायदे तय करे, ड्राइवरों को ट्रेनिंग दे, सफाई और सुरक्षा का इंतजाम करे, मगर ट्रक चलने से आपूर्ति शृंखला का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा काम करने लगेगा। इसके लिए पुलिस को खास हिदायत देनी होगी कि इस वक्त ट्रक वालों को बेवजह परेशान न किया जाए।

यह भी सुझाव दिया जा रहा है कि खासकर सब्जी उगाने वाले किसानों को छूट दी जाए, ताकि वे अपनी फसल सीधे नगर की बस्तियों में जाकर बेच दें। पास के शहर में भी लोगों को सस्ते में सब्जियां मिल जाएंगी।

एक बड़ा सवाल यह भी है कि शहरों में रहने वाले जो लोग लौट आए हैं, अब वे गांव में रहेंगे, तो करेंगे क्या? खेती के भरोसे इतने लोगों का गुजारा हो नहीं सकता, क्योंकि रकबा छोटा होता जा रहा है और परिवार बड़े। इसीलिए लोग भागकर शहर जाते थे। ऐसे में, अब जरूरी है कि लोगों के लिए वहीं रोजगार पैदा किए जाएं, जिसकी योजनाएं और घोषणाएं लंबे समय से चल रही हैं, या फिर इन सबकी जेब में पैसे डालने का इंतजाम किया जाए, जिसे वे खर्च कर सकें। एक रास्ता वह है, जो अभिजीत बनर्जी ने सुझाया था। सरकार सबको कुछ न कुछ पैसा बांटे।

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एक मांग यह है कि पीएम किसान योजना के तहत 8.7 करोड़ किसानों को जो 6,000 रुपये सालाना दिए जा रहे हैं, उन्हें बढ़ाकर कम से कम 24,000 रुपये कर दिया जाए। इसी तरह, महिलाओं के जन-धन खाते में 500 रुपये डालने का जो एलान किया गया है, उसका दायरा बढ़ाकर इतनी रकम सारे जन-धन खातों में डाली जाए। सबसे अहम सुझाव यह है कि किसान क्रेडिट कार्ड की लिमिट तीन लाख रुपये से बढ़ाकर साढे़ चार लाख या छह लाख रुपये कर दी जाए। इससे गांवों में मांग पैदा होगी, इकोनॉमी का चक्का घूमेगा और दबाव में फंसी भारत की अर्थव्यवस्था को गांवों से सहारा मिलेगा।

(यह लेखक के अपने विचार हैं, यह लेख हिंदुस्तान अखबार में प्रकाशित है)

आलोक जोशी वरिष्ठ पत्रकार

हजारों ऐसे लोग हैं, जो बरसों बाद अपने-अपने गांव लौटे हैं। इतने दिनों में हो सकता है कि उनके मन में कुछ अंकुर फूटे हों। वे अपने टूटे-फूटे घरों की मरम्मत करवाने की सोचें। खेत और फसल से जुड़ाव महसूस करें। उत्तराखंड में जो गांव ‘घोस्ट विलेज’ या भूतिया गांव कहलाते हैं, वहां इंसान दिखने लगे हैं।

इन लोगों के लिए ही नहीं, इस देश और समाज के लिए भी यह मौका है, इन्हें वापस इनकी जड़ों से जोड़ने का। थोड़ी सावधानी से काम किया जाए, तो गांवों में कारोबार, रोजगार और कमाई के साधन ही खड़े नहीं होंगे, अर्थव्यवस्था को एक नई ताकत भी मिल सकती है और विकास का एक नया मॉडल भी सामने आ सकता है।

 

 

-Adv-

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