पंचायत चुनाव: आधी आबादी बनाएगी गांव की सरकार, जाने कैसे

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गांव में महिलाओं की दशा की चर्चा करें तो हर किसी के जेहन में एक ही तस्वीर आएगी घूंघट निकालकर चूल्हा-चौका करते हुए परिवार व बच्चों को संभालने वाली. लेकिन यह तस्वीर गलत है, यह महिलाएं गांव की सरकार चलाती हैं और वो भी पुरुषों से बराबरी करते हुए. शायद आपको यकीन ना हो लेकिन आंकड़े बताते हैं कि गांव की सरकारी में उनकी बराबरी की हिस्सेदारी है. इनकी तो पढ़े-लिखे और खुले सोच वालों के द्वारा चुनी गयी देश और प्रदेश की सरकार में भी नहीं है.

पिछले चुनाव में दिखाया दमखम

पंचायत चुनाव जोर पकड़ने लगा है. नामांकन के साथ ही प्रत्याशियों ने चुनाव प्रचार के लिए पूरी ताकत झोंक दी है. महिलाएं भी घर की दहलीज के बाहर आकर अपना दमखम दिखा रही हैं. महिलाओं के लिए आरक्षित 33 प्रतिशत सीटों के अलावा अनारक्षित सीटों पर भी यह महिला उम्मीदवार अपना दावा ठोकेंगी. वर्ष 2015 में हुए पंचायत चुनाव के आंकड़ों की बात करें तो कुल प्रत्याशियों में से ग्राम प्रधान पद पर 43.8 प्रतिशत महिलाओं ने जीत दर्ज की. जिला पंचायत अध्यक्ष के 75 में से 44 यानि 59.5 फीसदी सीटों पर महिलाओं का कब्जा रहा. ब्लाक प्रमुख के पदों पर भी 51.1 प्रतिशत महिलाएं जीती थीं.

इस बार भी होगी मजबूत दावेदरी

पिछली बार की तरह इस बार भी ग्राम प्रधान के पद बड़ी तादाद में महिलाओं के लिए आरक्षित हैं. जिला पंचायत अध्यक्ष के 75 पदों में से 25 महिलाओं के लिए आरक्षित हैं. इसके अलावा अन्य 50 पदों पर भी महिलाओं की दावेदारी रहने की संभावना है. वहीं ब्लाक प्रमुख के कुल 300 पदों को महिलाओं के लिए आरक्षित किया गया है. इसके अलावा सामान्य पदों पर भी बड़ी संख्या में महिलाएं चुनाव लड़ेंगीं.

2015 के पंचायत चुनाव में कुछ एसा रहा महिलाओं का प्रदर्शन

-जिला पंचायत अध्यक्ष के 75 सीटों में से 44 यानि 59.5 सीटों पर कब्जा रहा
-ब्लाक प्रमुख के 821 पदों में से 417 यानि 45.3 पदों पर जीत दर्ज की
-जिला पंचायत सदस्य के 3112 पदों में से 1410 पर महिलाएं जीतीं, इनका प्रतिशत 45.3 रहा
-क्षेत्र पंचायत सदस्य के 77576 पदों में से 31919 पर जीत हासिल की. इनका प्रतिशत 41.12 रहा
-ग्राम प्रधान के 59162 पदों में से 25809 पर जीत हासिल करते हुए 43.8 प्रतिशत की हिस्सेदारी की.
-ग्राम पंचायत सदस्य के 742269 पदों में से 240820 पर यानि 39.9 प्रतिशत पर जीत दर्ज की.

संसद में हैं गिनती की महिलाएं

देश में लोकत्रंत की व्यवस्था को सुचारू संचालित करने वाली संसद में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों के बराबर नहीं हैं. भले ही देश में उनकी बराबरी की बात की जाती हो लेकिन सरकार में इनकी मौजूदगी नाम मात्र की रहती है. इस बार लोकसभा में सबसे ज्यादा 78 महिला सांसद चुनी गयीं. इसके बावजूद इनका प्रतिशत 14 है. लोकसभा की 542 सीटों के लिए हुए चुनाव में कुल 8049 कैंडीडेट्स मैदान में थीं. इनमें से 724 उम्मीदवार महिला थीं. जीत महज 78 को हासिल हुई. यूपी और बंगाल से 11-11 महिला सांसद चुनी गयी थीं. पिछले लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या 64 थी जो सिर्फ 11 प्रतिशत है. 9वीं लोकसभा में सबसे 28 महिला सांसद थीं. राज्यसभा की बात करें तो महिला सांसद महज 11 प्रतिशत हैं. कुल 236 सांसदों में से 27 महिला हैं.

विधान सभा में भी खास मौजूदगी नहीं

महिला जनप्रतिनिधियों की विधानसभा में भी संख्या ज्यादा नहीं है. यूपी विधानसभा की बात करें तो यहां महज 8 प्रतिशत महिला विधायक हैं. कुल 403 में से इनकी संख्या 32 है. राजस्थान विधानसभा में कुल 200 में से 28 महिला विधायक हैं. इनका प्रतिशत 14 हैं. बंगाल में अभी चुनाव हो रहा है. इस बार देखना है कि कितनी महिला विधायक चुनी जाती हैं. लेकिन पिछली बार 294 सीटों में से 34 पर महिलाओं का कब्जा था.

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विधानसभा में इनकी संख्या 12 प्रतिशत रही. बिहार में तो पिछली बार से महिला विधायकों की संख्या कम हो गयी. 243 सीटों पर हुए चुनाव में 26 पर महिलाएं जीतीं. इनका प्रतिशत 11 है. पिछली बार बिहार विधानसभा में 14 प्रतिशत सीटें महिलाओं के कब्जे में रहीं. इनकी संख्या कुल 24 रही. अन्य विधानसभाओं में भी महिलाओं की संख्या काफी कम है.

सम्मान के साथ मिलता है सबका सहयोग

गांव समाज और परिवार का सहयोग और सम्मान मिलता है. यह कहना ग्राम प्रधान पद संभाल चुकीं अरुणा सिंह और सीमा का. वो कहती हैं किसी भी व्यवस्था को बेहतर तरीके से चलाने की महिलाओं की क्षमता तो गांव के लोग बखूबी समझते हैं. वो महिला जनप्रतिनिधि को सम्मान देने के साथ पूरी सहयोग भी करते हैं. गाजीपुर में एक गांव की प्रधान रह चुकीं सीमा का कहना है कि उन्हें अपनी जिम्मेदारी निभाने में किसी तरह की परेशानी नहीं हुई. बल्कि उन्होंने समाज को एक सीख दी. उन्हें देखकर महिलाओं को बल मिला और उन्हों अपनी काबीलियत के मुताबिक कई तरह के काम शुरू किए औऱ परिवार को चलाने में पुरुषों का सहयोग किया. चौबेपुर के गांव की प्रधान रह चुकीं अरुणा सिंह कहती हैं कि गांव की महिलाएं सिर्फ चूल्हा-चौका करती हैं लोगों का यह भ्रम टूट जाता है जब उन्हें पता चलता है कि गांव की सरकार में महिलाओं की अहम भूमिका है. उन्होंने पांच साल तक गांव के विकास के लिए हर जरूरी कदम उठाया. अपना पद संभालते हुए उन्होंने भरपूर सम्मान मिला. साथ ही महिलाओं के प्रति समाज के बेहतर नजरिए का एहसास हुआ. गांव की अन्य महिलाओं को भी प्रेरणा मिली. गांव की सरकार एक आइना है उस समाज के लिए जो समझता है कि महिलाएं सिर्फ घर की दहलीज के भीतर रह सकती हैं.

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