प्रकृति के सफाई कर्मचारी हुए प्लास्टिक पॉल्युशन के शिकार

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क्या आपने कभी गलती से नमक की जगह चीनी खाया है, या फिर मिर्च पाउडर? कभी-न-कभी तो खाया ही होगा। लेकिन आपने कभी भी ऐसा गलती में ही किया होगा और आपके स्वाद में अंतर आ गया। ज़रा एक बार देखिये इस गलती से भी आपको कोई अच्छा ही स्वाद मिलता है, आपकी ज़िन्दगी खतरे में नहीं आ जाती है। आप सोच रहे होंगे में ऐसा क्यों बोल रहा हूं। लेकिन आज ये बातें हम सब के लिए ज़रूरी हो ताकि कोरोना लॉकडाउन के बाद जब अपने-अपने घरों से बाहर निकले तो कई चीज़ों को अपने दिमाग में रखें।

चूंकि में रहने वाला वाराणसी का हूं तो आपको बखूबी बनारसी चल-ढाल, बनारसी अंदाज़ के बारे में बता सकता हूं। वाराणसी वालों के लिए ठंड के मौसम में सुबह का समय घाटों के किनारे बहुत ही सुहावना होता है। सूर्योदय, घाट वॉक और साइबेरियन पक्षी। जी हां मिलों दूर से आके गंगा के पानी को अपना नया ठिकाना बनाना कई सालों से इन पक्षियों की आदत है। आर्कटिक की कड़ी सर्दियों को बर्दाशत नहीं कर पाने वाले इनके शरीर इन्हें यहां खींच लाते है। लेकिन क्या आप जानते है इन सीबर्ड का मुख्य आहार ओसियन लेवल पर पाए जाने वाले krils होते है, या फिर मरे हुए समुद्री जी। समुद्र के सतह पर पाए जाने वाली मछलियां, और तमाम अलग-अलग तरह के जीव-जंतुओं को ये सीबर्ड्स खाती है।

प्लास्टिक भी खाने लगी है सीबर्ड्स!

लेकिन वही कई वैज्ञानिको का कहना है कि अब सीबर्ड्स प्लास्टिक भी खाना चालू कर दी है, प्लास्टिक जोकि समुद्र की सतह पर पाई जाती है। इतना ही नहीं बल्कि साइंटिस्टों का दावा है कि 2050 तक करीब 200 से ज़्यादा प्रजातियां प्लास्टिक खाना शुरू कर देंगी। लेकिन सवाल उठता है कि आखिर क्यों ये प्लास्टिक खा रही है, या फिर भविष्य में खाएंगी। इसके जवाब से पहले आपको ये बता दें की ये तमाम सीबर्ड्स सतह पर पाए जाने वाले, मरे हुए जीव जंतु, सीवीड खाती है, तो एक तरह से ये बस अपना पेट ही नहीं भर रही है बल्कि हमारी प्रकृति को साफ़ भी कर रही है और इस सफाई की कीमत शायद हमारी सरकारें ये नहीं कर पाई है।

इसी क्रम में चलिए आपको प्लास्टिक और इन सीबर्ड्स के रिलेशन के बारे में बताते है। प्लास्टिक ने किसी को नहीं छोड़ा है। वैज्ञानिकों का कहना है कई मरे हुए सीबर्ड्स पर जब शोध हुई तो उनके पेट में से प्लास्टिक के टुकड़े पाए गए थे। और ये होना लाज़मी है क्योंकि प्लास्टिक उसके सस्ते दाम की वजह से लोगों की आम जीवन का हिस्सा बन चुका है। हर गली, हर मोहल्ले, हर दुकान में आपको प्लास्टिक ज़रूर मिल जाएगा, और ऐसा नहीं है कि सरकार ने प्लास्टिक को मार्किट में से हटाने के लिए कुछ नहीं किया, कई बार प्लास्टिक पर बैन लगाया गया लेकिन “जुगाड़” ने सारी मेहनत पर पानी फेर दिया। नतीजा ये रहा की प्लास्टिक के खपत के साथ प्लास्टिक पोल्लुशन दो गुने रफ़्तार से बढ़ता गया।

आखिर क्यों प्लास्टिक खाती है ये पक्षियां ?-

ऐल्बाट्रॉस, सीबर्ड और तमाम ऐसी पक्षियां कभी कदर गलती से प्लास्टिक को अपना शिकार समझ के उन्हें खा जाती है। जैसे की squid एक ऐसा जलीय जानवर है जिसे अल्बाट्रोस खाया करते है, वही कई मछलियों के अंडे भी पानी के सतह पर तैरते रहते है, और भूखी पंछियां इन सब चीज़ों में कंफ्यूज होके प्लास्टिक निगल जाती है। अब दूसरी चीज़ है कि आखिर ये कौन सा प्लास्टिक है और ये आता कहा से है? महासागरों में लगातार डिस्पोसे किए जा रहे प्लास्टिक वास्तविकता में इसका मेन सोर्स है। हांलाकि कई ऐसी देश है जो इसे सही तरीके से डिस्पोज करने के उपाय बना रहे है, लेकिन ये बस “कुछ देश है।” ये भी है कि पाए जाने वाले लगभग सिंगल यूज़ प्लास्टिक की केटेगरी में आते है जिसे रीसाइकिल नहीं किया जा सकता है जैसे प्लास्टिक बैग, स्ट्रॉ इत्यादि।

कितने खतरनाक है ये प्लास्टिक ?-

सीबीर्डस के साथ-साथ प्लास्टिक ने पानी के अंदर रहने वालों के लिए भी एक मुसीबत की दीवार खड़ी कर दी है। आपको बता दें की जब ये प्लास्टिक छोटे-छोटे टुकड़ों में ब्रेकडाउन होते है तब ये एक गंध फैलते है जो मरे हुए जानवरों से निकलती है, जिससे की सीबीर्डस उनके पास आती है। ये बरबाद करने वाले चेमिकल्स होते है जैसे की, पोलयचलोरिनेटेड बिफनेल, डिऑक्सिन्स।

एक बार अगर गौर करे तो आपको समझ में आएगा कि, इन सीबीर्डस की बनावट ऐसी है कि इन्हे प्रकृति को साफ़ करने कि ज़िम्मेदारी है, और ऐसी ज़िम्मेदारी हर एक को इस धरती पे मिली हुई है ताकि एक साइकिल चलती रहे। गैरतलब है कि हमारे आकांक्षाए और लालच जाने-अनजाने में इन प्राकृतिक वैज्ञानिकों को काफी नुक्सान पंहुचा रहा है। तो अगली बार से प्लास्टिक इस्तेमाल करने और उसे फैकने से एक बार सोचे।

इस आर्टिकल के लेखक एक स्‍टूडेंट हैं। जो सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय मुदृदों पर लिखते रहते हैं।

वैभव द्विवेदी स्‍टूडेंट

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-Adv-

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