कोरोना और आपातकालीन चिकित्सा तंत्र की जरूरत

आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं के प्रस्ताव बरसों से लंबित हैं, लेकिन इन पर सरकारें आगे नहीं बढ़ सकीं।

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आजकल विश्व के किसी भी हिस्से में कोई नई बीमारी फैलती है, तो उसे हमारे देश में पहुंचने में ज्यादा समय नहीं लगता। पिछले एक-डेढ़ दशक के दौरान हमने सार्स, बर्ड फ्लू, निपाह और अब कोविड-19 के मामलों को फैलते देखा है। इन बीमारियों की रोकथाम के लिए हमारा मौजूदा चिकित्सा तंत्र अपनी क्षमता के हिसाब से कहीं ज्यादा कार्य कर रहा है। लेकिन जिस प्रकार से पूरी दुनिया में आज कोविड का प्रकोप फैला है और काफी हद तक भारत बचा हुआ है, उस हिसाब से देखें, तो हमारी चिकित्सा तैयारियां पर्याप्त नहीं हैं। ऐसी खतरनाक बीमारियों की रोकथाम, निगरानी और उपचार के लिए अलग से एक प्रतिबद्ध आपातकालीन चिकित्सा तंत्र की जरूरत होती है, जो हमारे यहां पूरी तरह से नदारद है।

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सच तो यह है कि देश की सवा अरब से ज्यादा आबादी के लिए मौजूदा चिकित्सा सेवाएं पर्याप्त नहीं हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मानकों के अनुसार- प्रति 1,000 आबादी पर एक डॉक्टर होना चाहिए, लेकिन अपने देश के सरकारी चिकित्सा तंत्र की बात करें, तो 11,000 लोगों पर एक सरकारी डॉक्टर है। इसी प्रकार, बेड, नर्स, पैरा-मेडिकल स्टाफ, स्वास्थ्य केंद्रों आदि की भी भारी कमी है। देश में छह लाख डॉक्टरों और 20 लाख नर्स व पैरा-मेडिकल स्टाफ की कमी है। एक तरफ, चिकित्सा तंत्र कम है, तो दूसरी तरफ मौजूदा तंत्र के आगे पहले से ढेरों चुनौतियां हैं। जीवन शैली से जुड़ी बीमारियां और गैर-संचारी रोगों में इजाफा हो रहा है, तो उधर बढ़ती गरमी और जलवायु में आ रहे अन्य बदलावों के चलते वायरस और बैक्टीरिया जनित बीमारियों में इजाफा हो रहा है। ऐसे में, इसी चिकित्सा तंत्र के समक्ष तब दोहरी चुनौती पैदा हो जाती है, जब उसे अपना मौजूदा काम छोड़कर दूसरे मोर्चे पर काम करना पड़ता है। जब भी मौजूदा चिकित्सा सेवाओं को नई चुनौतियों से निपटने में लगाया जाता है, तो अन्य बीमारियों के उपचार का काम ठप सा हो जाता है।

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पिछले डेढ़-दो दशकों में कई बार आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं को मजबूत करने की बात उठी। ये सेवाएं वैश्विक बीमारियों के फैलाव को रोकने का कार्य करेंगी। जब देश में कोई प्राकृतिक आपदा आएगी, तो उस दौरान प्रभावित क्षेत्रों में जाकर चिकित्सा सेवाएं प्रदान करेंगी। हादसों की स्थिति में भी इन सेवाओं का उपयोग किया जा सकता है। जब ऐसी जरूरत नहीं हो, तब ये दूरदराज के इलाकों में सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में शिविर लगाकर बीमारियों का उपचार करेंगी। इसके लिए एक तीन सौ बेड का सचल अस्पताल बनाने पर भी चर्चा हुई थी, जिसे जरूरत पड़़ने पर कहीं भी एयरलिफ्ट करके पहुंचाया जा सके। लेकिन ये प्रस्ताव सालों से लंबित हैं और इन पर सरकार आगे बढ़ती हुई नहीं दिख रही है।

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आज जब देश में कोविड-19 जैसी घातक बीमारी ने दस्तक दे दी है, तब किसी अस्पताल में मास्क जैसी बुनियादी सामग्री के लिए डॉक्टरों को हड़ताल की चेतावनी देने के लिए मजबूर होना भी हमारी तैयारियों की कलई खोलता है। हमारे पास जहां आपातकालीन सेवाओं के लिए अलग से डॉक्टरों, नर्सों, पैरा-मेडिकल स्टाफ की पर्याप्त संख्या होनी चाहिए, वहीं बचाव के उपकरणों और दवा Medicine आदि की समुचित रूप से उपलब्धता भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।

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यह लेखक के अपने विचार हैं, यह लेख हिंदुस्तान अखबार में प्रकाशित है।

मदन जैड़ा ब्यूरो चीफ, हिन्दुस्तान

कोरोना संकट के वक्त आज देश को जो सबसे बड़ा सबक लेना है, वह यह कि दवाओं Medicine के कच्चे माल (एपीआई) के लिए हमें मात्र एक देश चीन पर अपनी निर्भरता खत्म करनी होगी। दवा के कच्चे माल का उत्पादन पहले देश में बडे़ पैमाने पर होता था, लेकिन चीन से आ रही सस्ती एपीआई के कारण देश में उत्पादित कच्चे माल की बिक्री घटने लगी, ऐसे में देशी कंपनियों ने उनका उत्पादन बंद कर दिया। 70 फीसदी तक कच्चा माल चीन से आने लगा। आज कोरोना संक्रमण के चलते चीन के कई प्रांतों में इसका उत्पादन बंद है। मुश्किल समस्या यह है कि न तो आनन-फानन में देश में इसका उत्पादन हो सकता है, और न ही तुरंत किसी अन्य देश से आयात किया जा सकता है। मौजूदा समस्या से निपटने के लिए भारत ने दूसरे देशों को अपनी दवाओं Medicine का निर्यात बंद कर दिया, ताकि देश में दवाओं Medicine की जरा भी कमी नहीं हो। यह कदम उठाना जरूरी था, लेकिन इस पूरी कवायद से भारत समेत कई देशों के समक्ष दवाओं Medicine की काफी बड़ी किल्लत पैदा हो सकती है।

-Adv-

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