वो शख्सियत, जिसने जंगलों को बचाने के लिए लगा दी थी जान की बाजी

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भारत के पर्यावरण रक्षा के इतिहास में 26 मार्च का एक खास मुकाम है। इसी दिन पेड़ों को बचाने के लिए महिलाएं उनसे चिपककर खड़ी हो गई थीं और ठेकेदार के आदमियों को ललकारा था कि पेड़ों से पहले उनलोगों को काटें। थक-हारकर ठेकेदार को पेड़ों को काटने के अपने इरादे को त्यागना पड़ा। इस आंदोलन को चिपको आंदोलन के नाम से जाना गया। चिपको आंदोलन का असर देश के बाकी हिस्सों पर भी पड़ा। आज इसी चिपको आंदोलन को डूडल बनाकर गूगल नमन कर रहा है। इस आंदोलन में सबसे अहम भूमिका गौरा देवी नाम की वीरांगना ने निभाई थी। ऐसे मौके पर जब गूगल चिपको आंदोलन को सलाम कर रहा है, आइये आज इसमें अहम भूमिका निभाने वाली गौरा देवी के बारे में जानते हैं…

26 मार्च, 1974 को शुरु हुआ चिपको आंदोलन

26 मार्च, 1974 को पेड़ों की कटाई रोकने के लिए ‘चिपको आंदोलन‘ शुरू हुआ। उस साल जब उत्तराखंड के रैंणी गांव के जंगल के लगभग ढाई हजार पेड़ों को काटने की नीलामी हुई, तो गौरा देवी ने अन्य महिलाओं के साथ इस नीलामी का विरोध किया। इसके बावजूद सरकार और ठेकेदार अपने फैसले पर अड़े रहे। जब ठेकेदार के आदमी पेड़ काटने पहुंचे, तो गौरा देवी और उनके 21 साथियों ने उन लोगों को समझाने की कोशिश की। जब उन्होंने पेड़ काटने की जिद की तो महिलाओं ने पेड़ों से चिपक कर उन्हें ललकारा कि पहले हमें काटो फिर इन पेड़ों को भी काट लेना। आखिर में ठेकेदार को जाना पड़ा। बाद में स्थानीय वन विभाग के अधिकारियों के सामने इन महिलाओं ने अपनी बात रखी। इसका परिणाम सुखद रहा और रैंणी गांव का जंगल नहीं काटा गया। इस तरह यहीं से ‘चिपको आंदोलन’ की शुरुआत हुई।

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1925 में चमोली जिले में हुआ था गौरा देवी का जन्म

गौरा देवी का जन्म 1925 में चमोली जिला के लाता नाम के गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम नारायण सिंह था। उन्होंने पांचवीं क्लास तक पढ़ाई की थी। सिर्फ 11 साल की उम्र में उनकी शादी रैंणी गांव के मेहरबान सिंह नाम के व्यक्ति से हुई। रैंणी भोटिया (तोलछा) का स्थायी आवासीय गांव था, ये लोग अपनी गुजर-बसर के लिये पशुपालन, ऊनी कारोबार और खेती-बाड़ी किया करते थे।

प्रशासन ने सड़क निर्माण के दौरान हुई क्षति का मुआवजा देने की तिथि 26 मार्च तय की गई, जिसे लेने के लिए सभी को चमोली आना था। इसी बीच वन विभाग ने सुनियोजित चाल के तहत जंगल काटने के लिए ठेकेदारों को निर्देश दिया था कि 26 मार्च को चूंकि गांव के सभी मर्द चमोली में रहेंगे और समाजिक कायकर्ताओं को बातचीत के बहाने गोपेश्वर बुला लिया जाएगा और आप मजदूरों को लेकर चुपचाप रैंणी चले जाओ और पेड़ों को काट डालो।

21 महिलाओं के साथ शुरु हुआ आंदोलन

इसी योजना पर अमल करते हुए श्रमिक रैंणी के देवदार के जंगलों को काटने के लिए चल पड़े। इस गतिविधि को एक लड़की ने देख लिया और उसने तुरंत इसके बारे में गौरा देवी को बताया। गांव में मौजूद 21 महिलाओं और कुछ बच्चों को लेकर वह जंगल की ओर चल पड़ीं। इनमें बती देवी, महादेवी, भूसी देवी, नृत्यी देवी, लीलामती, उमा देवी, हरकी देवी, बाली देवी, पासा देवी, रुक्का देवी, रुपसा देवी, तिलाड़ी देवी, इन्द्रा देवी शामिल थीं।

भाइयो, ‘यह जंगल हमारा मायका है’

उन्होंने पेड़ काटने आए मजदूरों से कहा ‘भाइयो, यह जंगल हमारा मायका है, इससे हमें जड़ी-बूटी, फल-सब्जी और लकड़ी मिलती है, जंगल काटोगे तो बाढ़ आएगी, हमारे घर बह जाएंगे, आप लोग खाना खा लो और फिर हमारे साथ चलो, जब हमारे मर्द आ जाएंगे तो फैसला होगा।’ ठेकेदार और वन विभाग के आदमी उन्हें डराने-धमकाने लगे, उन्हें बाधा डालने में गिरफ्तार करने की भी धमकी दी, लेकिन महिलाएं नहीं डरीं। ठेकेदार ने बंदूक निकालकर जब धमकाना चाहा तो गौरा देवी ने अपनी छाती तानकर गरजते हुए कहा, ‘मारो गोली और काट लो हमारा मायका।’ इसपर मजदूर सहम गए।

इंदिरा सरकार ने पेड़ों की कटाई पर 15 सालों के लिए लगाई थी रोक

इस मौके पर गौरा देवी ने जिस अदम्य साहस का परिचय दिया, उससे बाकी महिलाएं प्रभावित हुए बगैर नहीं रह सकीं। उनके अंदर भी पर्यावरण के लिए लड़ने-मरने का जज्बा पैदा हो गया। महिलाएं पेड़ों से चिपक गईं और कहा कि हमारे साथ इन पेड़ों को भी काट लो। ठेकेदार और उनके आदमियों ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि महिलाएं इस तरह का साहस दिखाएंगी। अंत में उनलोगों ने हार मान ली और पेड़ों को काटे बगैर वहां से चले गए। बाद में यह आंदोलन देश के अन्य राज्यों में भी फैला। साल 1980 में इंदिरा गांधी ने हिमालयी वनों में पेड़ों की कटाई पर 15 सालों के लिए रोक लगा दिया था।

नवभारत टाइम्स

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