इमरजेंसी : 26 जून 1975 का वह मनहूस सबेरा – भाग एक

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स्‍वतंत्र भारत के राजनैतिक इतिहास में इमरजेंसी का दौर काली स्‍याही से दर्ज है। तकरीबन 21 महीने के उस दौर में भारत ने विरोध की उफनती लहरों को भी देखा तो दूसरी तरफ सत्‍ता के क्रूर दमनात्‍मक रवैये का भी गवाह बना। इमरजेंसी के उसी कालखंड को वरिष्‍ठ पत्रकार व टीवी9 भारतवर्ष के न्‍यूज डायरेक्‍टर हेमंत शर्मा ने अपने पिता पं हनुमान शर्मा ‘मनु शर्मा’ की स्‍मृतियों के साथ अपने फेसबुक वाल पर संजोया है। उन्‍होंने जो लिखा उसका पहला भाग उसी रूप में आपके सामने है।

26 जून का मनहूस सबेरा था। उदास और डरावना। रात में इमरजेंसी लग चुकी थी। दिल्ली में बड़े नेताओं की गिरफ्तारियां भी हो गयी थी। दिल्ली में तो अख़बारों ने एडिशन रोक कर यह खबर ले ली पर बनारस के सुबह के अख़बारों में यह खबर नहीं थी। सुबह- सुबह जनवार्ता के सम्पादक ईश्वर देव मिश्र का फ़ोन पिता जी के लिए आया।। फ़ोन सुनते ही पिता जी के चेहरे पर चिन्ता की लकीरें थी। उस समय मेरे मोहल्ले में सिर्फ मेरे यहां ही फ़ोन होता था। नं था 5564। पिता जी ने बताया इमरजेंसी लग गयी है। मई में ही मैं नवी कक्षा से दसवीं में गया था। इमरजेंसी के नाम पर अस्पताल की इमरजेंसी जानता था। समझ नहीं पाया कि इमरजेंसी क्या है। वैसे भी उस वक्त बच्चों में एक्सपोज़र कम होता था।

हलॉंकि पिता जी जेपी की संघर्ष वाहिनी के सहसंयोजक थे। मैं जेपी की बेनियाबाग वाली सभा के पहले निकले जुलूस में भी शामिल था। बैनर भी उठा के चला पर मेरे बैनर पर लिखा नारा उस वक्त मेरे समझ से परे था। बाक़ी बैनरों पर तो ‘जो हमसे टकराएगा चूर चूर हो जायगा।’ या डायरेक्ट एक्शन वाले नारे थे। पर मेरे बैनर पर लिखा था। ‘हमें सत्ता नही व्यवस्था परिवर्तन चाहिए।’ यह मेरे गले नहीं उतर रहा था। इसलिए मैं जेपी आन्दोलन और देश की स्थिति से तो वाक़िफ़ था। पर इमरजेंसी की भयावहता से परिचित नही था।

बहरहाल पिता जी के पास फ़ोन इसलिए आया था कि जनवार्ता अख़बार का दस बजे विशेष संस्करण छपना था। और उसमें उनकी कार्टून कविता संकंटमोचन जानी थी। जनवार्ता बनारस का दैनिक अख़बार था जिसकी गिनती जेपी आन्दोलन के अग्रणी अख़बारों में होती थी। सन् 1970 में बनारस के कुछ मित्रों ने मिलकर सहकारिता के आधार पर यह दैनिक पत्र निकाला था। उसके संपादक मंडल में उस समय के प्रतिष्ठित पत्रकार ईश्वर चन्द्र सिन्हा, श्यामा प्रसाद शुक्ल ‘प्रदीप’, ईश्वर देव मिश्र , धर्मशील चतुर्वेदी, और मेरे पिता जी थे।

इस अख़बार के एडिट पेज पर हर रोज़ पिता जी एक कविता लिखते थे। पांच छ लाईन की। इसे आप ‘खबरदार कविता’ या कार्टून कविता भी कह सकते है। जिसके तहत उस रोज की किसी खबर या वक्तव्य पर सार्थक व्यंग प्रधान टिप्पणी होती थी ।पिता जी ‘संकटमोचन’ छद्म नाम से लिखते थे।हर रोज़ रविवार को छोड़ कर। आपातकाल के समय को छोड़कर लगातार तेईस वर्षों तक वे लिखते गए। जिन्हें संदर्भों के बिना नहीं पढ़ा जा सकता। ऐसी कोई सात हज़ार कविताएं होगी।

यह मैं इसलिए बता रहा हूं कि कैसे साहित्य अपने युग का दस्तावेज होता है। कैसे उस वक्त की कविताओं में उस समाज की घुटन और बग़ावत दर्ज है। चाहे वो संकटमोचन हो। धर्मवीर भारती की मुनादी हो। बाबा नागार्जुन की इन्दु जी हो। या दुष्यन्त की कविताए । हालांकि उन्होंने इमरजेंसी कुछ ही महीनों तक देखी। पर इन कविताओं से आपको इमरजेंसी का संत्रास और अत्याचार का पता चलेगा।

जैसे ही घर में पता चला इमरजेंसी लगी है। हम रेडियो की ओर दौड़े। तब वह सुबह के बाद सूचना का इकलौता साधन हुआ करता था। पर यह क्या। ये आकाशवाणी है के बाद समाचार वाचक की जगह इन्दिरा जी की आवाज़ थी। उनका देश को सम्बोधन चल रहा था। वो बता रही थी कि देश में राष्ट्रपति ने आंतरिक आपातकाल की घोषणा की है। सारे नागरिक अधिकार समाप्त कर दिए गए हैं। क्यों की आंतरिक अशांति की आशंका थी। कुछ तत्व सुरक्षाबलों को बग़ावत के लिए भड़का रहे थे। उनका इशारा एक दिन पहले दिल्ली के रामलीला मैदान में जयप्रकाश जी की रैली की तरफ़ था। अबतक हम मामला और उसकी गम्भीरता समझ चुके थे। कि नागरिक अधिकारों का गला घोटा गया। लोकतंत्र अंधे कुएं की ओर गया।

दरअसल इमरजेंसी की आहट देश में बारह जून से ही सुनाई देने लगी थी। जिस रोज इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राजनारायण की याचिका पर प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी का चुनाव रद्द कर दिया था। और इसी रोज गुजरात विधानसभा के चुनावों के नतीजे आए जिसमें कांग्रेस की बुरी तरह हार हुई। देश की राजनीति ने पलटा खाया। सत्ता से कांग्रेस के बेदख़ली की शुरूआत हुई। प्रधानमंत्री रहते इन्दिरा गांधी का चुनाव हाईकोर्ट ने रद्द किया। छ साल तक उनके चुनाव लड़ने पर पाबन्दी लगाई। आरोप था चुनाव में सरकारी मशीनरी के बेजा इस्तेमाल का। हराया था बनारस के जुझारू समाजवादी राजनारायण ने।

लेखक नेशनल चैनल टीवी9 भारत वर्ष के न्‍यूज डायरेक्‍टर की जिम्‍मेदारी निभाते हुए लगातार साहित्‍य सृजन में लगे हुए हैं। यह लेख लेखक की फेसबुक वॉल से लिया गया है।

हेमंत शर्मा ख्‍यातिलब्‍ध पत्रकार

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-Adv-

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