baatichokha

इकलौता ऐसा रेस्त्रां जहां बेटी के साथ आने पर ही मिलता है प्रवेश

छोरी छोरों से कम हैं के..ये डॉयलॉग तो हमने आपने फिल्म में सुना ही है..नहीं नहीं मैं यहां आपको किसी फिल्म की कहानी नहीं बताने वाली। बल्कि मैं इस डॉयलॉग के पीछे छिपे संदेश के बारे में बात कर रही हूं। लड़कियां लड़कों से किसी भी मामले में पीछे नहीं हैं। चाहे देश चलाने की बात हो या चांद पर जाने की। समाज में ऐसा ही संदेश दे रहा है बाटी चोखा (BatiChokha) रेस्टोरेंट।

रेस्त्रां बेटी बढ़ाओं के नारे को साकार कर रहा है। इसलिए रेस्टोरेंट के मुख्य गेट पर ही लिखा है खास संदेश..कि बिना बेटी या महिला के  पुरुषों का प्रवेश वर्जित है।

यहां गांव की कम पढ़ी लिखी महिलाओं को भी आत्मनिर्भर बनाने के लिए भी प्रेरित कर रहा है। ये रेस्त्रां बाहर से हाईटेक तो है ही अंदर का आकर्षण देखते बनता है। रेस्त्रां में खास गांव के ठेठ स्वाद आपकी जुबान से दिनों तक रहेगा। …हो भी क्यों नहीं रेस्त्रां में गांव की ही कम-पढ़ी लिखी महिलाओं को पारंपरिक परिधान में हुबहू वहीं लुक देगा जब आप किसी गांव के घर में प्रवेश करते हैं। इतना ही नहीं  रेस्टोरेंट के मुख्य गेट से ही झलकता है महिलाओं को प्रेरित करने का संदेश।

इस रेस्त्रां की खासियत हैं यहां सिंगल पुरुष का आना मना है। मतलब अगर कोई पुरुष अपने परिवार बहन या बेटी के साथ आता है तो ही वो रेस्त्रां में प्रवेश कर सकता है।

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इतना ही नहीं, काम करने वाली महिलाओं की सुविधा को देखते हुए रेस्त्रां का समय सुबह से शाम का रखा गया है। वाराणसी से कोलकाता जाने वाले हाइवे के किनारे डाफी इलाके में करीब 15 हजार वर्गफुट में बेटियों को पूरी तरह समर्पित रेस्त्रां ‘बाटी चोखा’ खोलने की सोच वाराणसी के युवा कारोबारी सिद्धार्थ दुबे की है।

बताते हैं कि इस रेस्त्रां के जरिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संदेश समाज के हर तबके तक पहुंचाने का प्रयास है। रेस्त्रां के मेन गेट पर चस्‍पा मुनादी यहां आने वालों को सबकुछ समझाने और बताने के लिए काफी है। इसमें लिखा है- हर खासो-आम को आगाह किया जाता है कि खरबदार रहें, यह रेस्त्रां बेटियों को समर्पित है। लिहाजा बिना महिला के साथ इसमें प्रवेश वर्जित है।

महिला सशक्तिकरण की झलक

रेस्त्रां में मेन गेट से लेकर पूरे कैंपस में वुमन इम्‍पावरमेंट की झलक मिलती है। प्रवेश द्वार पर भारत की पहली महिला अन्‍तरिक्ष यात्री कल्‍पना चावला और एक पैर न होने के बावजूद एवरेस्‍ट फतह करने वाली भारत की पहली महिला अरुणिमा सिन्‍हा की बड़ी फोटो लगी है। आगे बढ़ने पर कैंपस में कहीं तुलसी पूजा तो कहीं अनाज चुनते और सब्‍जी काटते महिलाएं दिख जाती हैं। सबसे खास यह कि ऐसी महिलाएं जो जिंदगी में पहली बार किसी रेस्त्रां में कदम रख रहीं उन्‍हें तथा साथ रहे परिजन को मुफ्त में स्‍वादिष्‍ट व्‍यंजन चखने का मौका भी मिल रहा।

गांव की महिलाओं के जिम्‍मे पूरा काम

बड़े शहरों की हाईटेक सिक्यॉरिटी एजेंसी और उनके गार्डों की जगह यहां डाफी गांव की रहने वाली आशा देवी साड़ी पहने और हाथ में डंडा लिए सुरक्षा गार्ड की ड्यूटी करती हैं। खाने की टेबल पर भारतीय वेशभूषा में गीता, मंजू, ममता और इन जैसी आधा दर्जन महिला वेटरों से सामना होता है। वहीं कैश काउंटर पर माया तो पूर्वांचल की फेमस बाटी, बैगन का चोखा और हंडिया में दाल और चावल पकाने वाली भी वे महिलाएं हैं जो कुछ दिनों पहले तक घर की चौखट के अंदर चूल्‍हे-चौके में ही व्‍यस्‍त रहती रही हैं।

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